भूमि,उर्जा,जल बचाओ

भूमि,उर्जा,जल बचाओ
हम और हमारा वातावरण

Friday, May 29, 2020

कक्षा10 आनुवांशिकता और जैव विकास

आनुवांशिकता
कुछ ऐसे लक्षण सभी जीवों में होते हैं, जो उन्हें अपने जनकों से प्राप्त होते हैं और पीढ़ी – दर – पीढ़ी चलते रहते हैं। इन लक्षणों को आनुवंशिक लक्षण कहते हैं। इन लक्षणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी या एक जीव से दूसरे जीव में जाना आनुवंशिकता (heredity) कहलाता है। आनुवंशिकता के कारण ही पीढ़ी – दर – पीढ़ी जीवों में समानता बनी रहती है। इसी कारण मनुष्य की सन्तान मनुष्य, बन्दर की सन्तान बन्दरे, गाय की सन्तान गाय तथा हाथी की सन्तान सदैव हाथी ही रहती है। विज्ञान की उस शाखा को जिसमें आनुवंशिक लक्षणों के माता – पिता से सन्तान में आने की रीतियों का अध्ययन करते हैं, आनुवंशिकी कहते हैं। 

 इसकी खोज ग्रेगर जॉहन मेण्डल ने सन् 1866 में की। 
मेंड़ल ने अपने प्रयोगो के लिए मटर (Paisum sativa) के पोधे को चुना क्योंकि मटर का पोधा एक वर्षीय होता है




                      प्रभाविता का नियम
जीन या कारक





बहुविकल्पीय प्रश्न
प्रश्न 1.
आनुवंशिकता के प्रयोग के लिए मेण्डल ने निम्नलिखित में से कौन – से पौधों का उपयोग किया? 
(a) पपीता
(b) आलू
(c) मटर
(d) अंगूर
उत्तर:
(c) मटर

प्रश्न 2.
विपरीत लक्षणों के जोड़ों को कहते हैं।
(a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ
(b) निर्धारक
(c) समयुग्मजी
(d) समरूप
उत्तर:
(a) युग्मविकल्पी या एलिलोमॉर्फ

प्रश्न 3.
मटर में बीजों का गोल आकार तथा पीला रंग दोनों होते हैं।
(a) अप्रभावी
(b) अपूर्ण प्रभावी
(c) संकर
(d) प्रभावी
उत्तर:
(d) प्रभावी

प्रश्न 4.
उद्यान मटर में अप्रभावी लक्षण है। (a) लम्बे तने
(b) झुर्रादार बीज
(c) गोल बीज
(d) फैली हुई फली
उत्तर:
(b) झुर्रादार बीज

प्रश्न 5.
एकसंकर संकरण के F2 पीढ़ी में शुद्ध तथा संकर लक्षणों वाले पौधों का अनुपात होगा है।
(a) 2 : 1
(b) 3 : 1
(c) 1 : 1
(d) 1 : 3
उत्तर:
(c) 1 : 1

प्रश्न 6.
एक संकर क्रॉस का जीन प्रारूप अनुपात होता है।
(a) 3 : 1
(b) 1 : 2 : 1
(c) 2 : 1 : 2
(d) 9 : 3 : 3 : 1
उत्तर:
(b) 1 : 2 : 1

प्रश्न 7.
मटर के लम्बे पौधों का क्रॉस बौने पौधों से कराने पर प्रथम पीढ़ी में लम्बे मटर के पौधे प्राप्त होते हैं, द्वितीय पीढ़ी में प्राप्त पौधे होंगे।
(a) लम्बे तथा बौने दोनों
(b) लम्बे मटर के पौधे
(c) बौने मटर के पौधे
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) लम्बे तथा बौने दोनों

प्रश्न 8.
F2 पीढ़ी में 3 : 1 अनुपात प्राप्त होता है। 
(a) एक संकर क्रॉस में
(b) द्विसंकर क्रॉस में
(c) (i) तथा (ii) दोनों में
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(a) एक संकर क्रॉस में

प्रश्न 9.
पृथक्करण का नियम प्रस्तुत किया था 
(a) चार्ल्स डार्विन ने
(b) ह्यूगो डी ब्रीज ने
(c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने
(d) राबर्ट हुक ने
उत्तर:
(c) जॉन ग्रेगर मेण्डल ने

प्रश्न 10.
गुणसूत्र किस पदार्थ के बने होते हैं? 
(a) प्रोटीन
(b) आर०एन०ए०
(c) डी०एन०ए०
(d) डी०एन०ए० और प्रोटीन
उत्तर:
(d) डी०एन०ए० और प्रोटीन

प्रश्न 11.
मनुष्य में कौन – सा गुणसूत्र जोड़ा स्त्रीलिंग निर्धारण करता है?
(a) XY
(b) XX
(c) XXY
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) XX

प्रश्न 12.
सामान्य मनुष्य में गुणसूत्रों की संख्या है।
(a) 45
(b) 46
(c) 30
(d) 23
उत्तर:
(b) 46

प्रश्न 13.
मनुष्य के शुक्राणु में ऑटोसोम की संख्या कितनी होती है? (2016)
(a) 22
(b) 24
(c) 42
(d) 44
उत्तर:
(d) 44

प्रश्न 14.
मनुष्य में लड़का पैदा होगा जब
(a) माँ को पोषण गर्भावस्था में अधिक पौष्टिक हो
(b) पिता माँ से अधिक शक्तिशाली हो
(c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों
(d) बच्चे में XX गुणसूत्र हों
उत्तर:
(c) बच्चे में XY गुणसूत्र हों

प्रश्न 15.
लक्षण, जिनके जीन्स X गुणसूत्रों पर होते हैं, कहलाते हैं। (2011)
(a) लिंग प्रभावित
(b) लिंग सहलग्न
(c) लिंग सीमित
(d) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(b) लिंग सहलग्न

प्रश्न 16.
जीवन की उत्पत्ति हुई। (2012)
(a) सागर में
(b) धरती पर
(c) वायुमण्डल में
(d) अंतरिक्ष में
उत्तर:
(a) सागर में
जैव विकास 
मानव आनुवन्शिकी

मानव आनुवंशिकी से आप क्या समझते हैं? इसके जनक कौन थे? इसके क्या लाभ हैं? (2013)
उत्तर:
मानव आनुवंशिकी में मनुष्य के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने वाले लक्षणों या गुणों का अध्ययन किया जाता है। मानव आनुवंशिकी के जनक गाल्टन थे।

मानव आनुवंशिकी के लाभ (Advantages of Human Genetics) मानव आनुवंशिकी का अध्ययन मानव समाज के लिए अनेक प्रकार से लाभप्रद है। इसके द्वारा मानव संततियों में आने वाले रोगों के बारे में अध्ययन किया जाता है। इन रोगों के निदान के बारे में जानकारी प्राप्त कर, मनुष्य इनकी चिकित्सा पहले से ही कर सकता है। सुजननिकी (eugenics) द्वारा अच्छे लक्षणों की वंशागति के लिए समाज के आनुवंशिकी स्तर का अध्ययन किया जाता है।  इसके बाद निषेधात्मक (negative) अथवा स्वीकारात्मक (positive) विधियाँ काम में लायी जाती हैं, अर्थात् निम्नकोटि के आनुवंशिकी लक्षणों की वंशागति से व्यक्तियों को रोका जाता है अथवा उच्च कोटि के लक्षणों वाले व्यक्तियों को वंशागति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। दोनों प्रकार की सुजननिकी. के लिए विभिन्न प्रकार की विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं; जैसे- निषेधात्मक सुजननिकी के लिए वैवाहिक प्रतिबन्ध, बन्ध्यीकरण, सन्तति नियन्त्रण आदि के लिए गर्भपात इत्यादि तथा स्वीकारात्मक सुजननिकी के लिए उत्कृष्ट चयन, उच्च आनुवंशिक लक्षणों को अधिकाधिक उपयोग, उच्चकोटि के लक्षणों वाले पुरुष का वीर्य संचित करना तथा कृत्रिम गर्भाधान के लिए उसका उपयोग करना आदि।

यूथेनिक्स (euthenics) द्वारा पहले से ही वंशानुगत गुणों को अच्छा वातावरण प्रदान कर उपचारित किया जा सकता है। वर्तमान समय में जीन की खोजों के आधार पर अच्छे जीन को खराब जीन के स्थान पर बदला जा सकता है। इसको जीन सर्जरी तथा जीन इन्जीनियरिंग या जीन अभियान्त्रिकी (genic surgery and genetic engineering) कहा जाता है। इस प्रकार हम मानव आनुवंशिकता का अध्ययन करके एक सुदृढ़ मानव समाज की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें कोई भी मनुष्य बीमार, निम्नस्तरीय अथवा बुद्धिहीन उत्पन्न नहीं होगा।
आनुवंशिकी के गुणसूत्र सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। 
उत्तर:
इस सिद्धान्त के अनुसार।

सभी जीवों में प्रत्येक लक्षण के लिए कम – से – कम एक जोड़ी जीन या कारक अवश्य होते हैं।
आनुवंशिक लक्षणों के जीन या आनुवंशिक कारक गुणसूत्रों पर पंक्तिबद्ध होते हैं और गुणसूत्रों के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते हैं।
बहुकोशिकीय जीवों में जनने कोशिकाओं के माध्यम से विभिन्न पीढ़ियों में जैविक सम्बन्ध स्थापित रहता है। इसका अर्थ है कि आनुवंशिक लक्षणों के जीन जनन कोशिकाओं या युग्मकों द्वारा दूसरी पीढ़ी के जीवों में पहुँचते हैं।
किसी जीव के लक्षणों में शुक्राणु व अण्डाणु दोनों ही का बराबर का योगदान होता है।
युग्मक निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों के व्यवहार से प्रमाणित होता है कि जीन गुणसूत्रों पर होते हैं।
जीवों की प्रत्येक कोशिका में गुणसूत्र जोड़ों में मिलते हैं किन्तु युग्मकों में प्रत्येक गुणसूत्र – युग्म में से केवल एक गुणसूत्र होता है।
अगुणित शुक्राणु व अण्डाणु के संलयन से बना युग्मज द्विगुणित होता है जिससे पूर्ण जीव का विकास होता है।

जैव विकास के सम्बन्ध में डार्विन का सिद्धान्त या डार्विनवाद
चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin, 1809 – 1882) एक अंग्रेज जीव वैज्ञानिक थे। डार्विन ने समुद्री यात्राओं द्वारा विभिन्न देशों तथा द्वीपों के जीवों का अध्ययन किया और जीवों के विकास के सम्बन्ध में अपने सिद्धान्त को “प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों का उद्भव” (Origin of Species by Natural Selection) नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। डार्विन का सिद्धान्त प्राकृतिक वरणवाद या डार्विनवाद (theory of natural selection or Darwinism) के नाम से प्रचलित है। यह सिद्धान्त निम्नलिखित तथ्यों को आधार मानकर प्रतिपादित किया गया।

1. जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव प्रजनन द्वारा अपनी सन्तान उत्पन्न करता है। जीवों में सन्तान उत्पन्न करने की बहुत अधिक क्षमता होती है। निम्न श्रेणी के जन्तुओं में तो प्रजनन क्षमता इतनी अधिक होती है कि अगर सभी सन्ताने जीवित रहें, तो पृथ्वी पर उनके सिवा और कोई जन्तु दिखाई भी न देगा, परन्तु ऐसा नहीं होता। जीवों की संख्या की वृद्धि इस प्रकार रेखागणितीय अनुपात में हो सकती है।

2. जीवन संघर्ष सभी जीवों को जीवित रहने के लिए स्थान, प्रकाश तथा भोजन चाहिए, परन्तु सीमित स्थान तथा भोजन के कारण यह सम्भव नहीं हो पाता। अत: पैदा होते ही प्रत्येक जीव को जीवित रहने की आवश्यक सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसको जीवन संघर्ष कहते हैं। इसे जीवन संघर्ष के कारण ही रेखागणितीय अनुपात में बढ़ती जनसंख्या स्थिर रहती है। एक ही जाति के जीवों के मध्य होने वाला जीवन संघर्ष सबसे अधिक घातक होता है।

3. योग्यतम की उत्तरजीविता वही जीव जीवित रहता है, जो जीवन संघर्ष में वातावरण के अनुकूल होता है और आवश्यकतानुसार परिवर्तन करके स्वयं को और अधिक अनुकूल बना लेता है। अनुकूलन से वह सशक्त हो जाता है। संघर्ष में निर्बल जीव नष्ट हो जाते हैं अर्थात् योग्यतम ही जीवित रहता है। इस प्रकार प्रत्येक जाति के जीवों की संख्या लगभग स्थिर बनी रहती है।

4. प्राकृतिक वरण जीवित रहने के लिए जीवों में जो संघर्ष होता है, इसमें जो जीव प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल होते हैं, वे ही जीवित रहते हैं तथा अन्य नष्ट हो जाते हैं। अतः प्रकृति स्वयं ही श्रेष्ठ व अनुकूल जीवों का वरण करती है, जिसको प्राकृतिक वरण कहते हैं।

5. विभिन्नतायें प्रत्येक जाति के जीवों में विभिन्नतायें मिलती हैं। इन्हीं विभिन्नताओं के कारण कुछ जीव वातावरण के अनुकूल होते हैं। जो विभिन्नतायें उत्पन्न होती हैं, वे सन्तानों में वंशानुगत हो जाती हैं, जिससे सन्तान भी उस वातावरण के लिए अनुकूलित हो जाती है। यहाँ यह भी माना गया है। कि विभिन्नतायें लाभदायक अथवा हानिकारक हो सकती हैं। लाभदायक अथवा उपयोगी विभिन्नतायें ही जीव को योग्य बनाने में सक्षम होती हैं तथा उस जीव को जीवित रहने में सहायता करती हैं।

6. नयी जातियों की उत्पत्ति जीवन संघर्ष में योग्य सिद्ध करने के लिए उत्पन्न विभिन्नतायें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत होती रहती हैं, साथ – ही – साथ सन्तान में भी स्वयं कुछ विशेष लक्षण तथा विभिन्नतायें उत्पन्न हो जाती हैं। कुछ पीढ़ियों के बाद लक्षणों तथा विभिन्नताओं की वंशागति इतनी अधिक हो जाती है कि सन्तानें अपने पूर्वजों से भिन्न हो जाती हैं और इस तरह नयी जातियों की उत्पत्ति हो जाती हैं।

लैमार्कवाद को समझाइए। लैमार्कवाद की आलोचनाओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 15, 17)
या
उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त क्या है? (2012)
उत्तर:
लैमार्कवाद
जैव विकास के प्रचलित सिद्धान्तों में यह सबसे पुराना सिद्धान्त है। लैमार्क (1744 – 1829) एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक थे। इन्होंने 1809 ई० में जैव विकास के बारे में अपने सिद्धान्त को फिलोसॉफी जुलोजिक (Philosophie Zollogique) नामक पुस्तक में प्रकाशित कराया। उनका सिद्धान्त लैमार्कवाद (Lamarckism) के नाम से प्रचलित हुआ। इन्होंने मुख्यत: चार बातों पर प्रकाश डाला-

1. जीवों की आकार में वृद्धि की प्रवृत्ति जीवों में उनके शरीर अथवा विभिन्न अंगों के आकार में वृद्धि करते रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।

2. वातावरण का प्रभाव वातावरण के परिवर्तन के अनुसार जीव स्वयं को अनुकूल बनाने के लिए अपने शरीर की संरचना तथा आदतों में परिवर्तन कर लेता है। इस प्रकार के प्रभावों से उसके कुछ अंगों का उपयोग बढ़ सकता है, अन्य का अपेक्षाकृत कम हो जाता है। इस प्रकार उसके शरीर की रचना में परिवर्तन आ जाते हैं।

3. अंगों का उपयोग और अनुपयोग वातावरण में किसी अंग के उपयोग की अधिक आवश्यकता हो जाती है, तो वह अंग अधिकाधिक पुष्ट तथा विकसित हो जाता है। इसके विपरीत जो अंग कम प्रयोग में आता है, वह धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है और अन्त में लुप्त हो जाता है या अवशेषी अंग (vestigeal organ) का रूप ले लेता है।

4. उपार्जित लक्षणों की वंशागति वातावरण के प्रभाव से शारीरिक अंगों के लगातार उपयोग या अनुपयोग से जो नये परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं। ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँच जाते हैं। यदि उपार्जित लक्षणों की वंशागति का क्रम चलता रहे, तो सन्तानों में नये परिवर्तन स्थायी तथा नये लक्षण विकसित हो जायेंगे। इस प्रकार बनने वाली सन्तति अपने पूर्वजों से पूर्णतया भिन्न हो जायेगी और इस तरह नयी जाति का निर्माण हो जायेगा। अपने सिद्धान्त के समर्थन में लैमार्क ने जिराफ का उदाहरण दिया है। जिराफ दक्षिण अफ्रीका के रेगिस्तान में मिलते हैं। इनकी गर्दन तथा अगली टाँगें अधिक लम्बी होती हैं, जिनकी सहायता से ये ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। लैमार्क के अनुसार जिराफ के पूर्वज आकार में अपेक्षाकृत छोटे थे, उनकी गर्दन कम लम्बी तथा अगली टाँगें पिछली टाँगों के बराबर लम्बी थीं।

ये ऐसे युग में रहते थे, जब अफ्रीका की जलवायु इतनी गर्म तथा रेगिस्तानी नहीं थी। वहाँ घास के मैदाने थे जिनमें वे चरते रहते थे। धीरे – धीरे यहाँ की जलवायु शुष्क तथा रेगिस्तानी होने लगी। घास के मैदान लुप्त होते गये। अत: उन्हें गर्दन तथा अगली टाँगों को उचका – उचकाकर ऊँचे – ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के लिए विवश होना पड़ा। इस प्रकार गर्दन तथा अगली टाँगों के निरन्तर अधिक उपयोग करने के कारण दोनों ही अंगों की लम्बाई बढ़ती गयी।  यह उपार्जित लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते रहे और अन्त में जिराफ की वर्तमान जाति के स्थायी लक्षण बन गये। . एक अन्य उदाहरण में उन्होंने बताया कि सर्प का शरीर लम्बा होने के कारण उसे झाड़ियों आदि में घुसने में उसकी टाँगें असुविधाजनक थीं। इस प्रकार उसने टाँगों का उपयोग करना बन्द कर दिया। धीरे-धीरे उसकी टाँगें अनुपयुक्त होकर विलुप्त हो गई और वर्तमान बिना टाँगों वाली सर्यों की जातियाँ विकसित हुईं।

लैमार्कवाद की आलोचना
लैमार्कवाद के जैव विकास सम्बन्धी विचारों में अंगों के उपयोग – अनुपयोग की बात कही गई है, साथ ही इनसे उपार्जित लक्षणों को वंशानुगत लक्षण मान लिया गया है। वैज्ञानिकों ने अप्रमाणिकता के आधार पर इस विचार को पूर्णतः अस्वीकार कर दिया। इस आधार पर तो पहलवान का बच्चा पहलवान, अन्धे माता – पिता का बच्चा अन्धा होना चाहिए। एक लोहार के बराबर लोहा पीटते रहने से, उसके हाथ की पेशियाँ अत्यधिक मजबूत हो जाती हैं, किन्तु उसका यह लक्षण उसकी सन्तान में नहीं आता।

वीजमान (Wiesmann) नामक जर्मन वैज्ञानिक ने लैमार्कवाद का अत्यधिक विरोध किया। उन्होंने चूहों पर अनेक प्रयोग किये। एक प्रयोग में कई पीढ़ियों तक वे चूहों की पूँछ काटते रहे, किन्तु उन्हें अन्त तक एक भी पूँछ कटा चूहा प्राप्त नहीं हो सका। किसी भी सन्तति में चूहे की पूँछ उतनी ही लम्बी, मोटी तथा मजबूत मिली जितनी से उन्होंने अपने प्रयोग आरम्भ किये थे। लैमार्क के अनुसार तो अन्तिम पीढ़ी में प्राप्त चूहे बिना पूंछ वाले उत्पन्न होने चाहिए थे। वीजमान का मानना था कि अंगों में उपार्जित होने वाले लक्षण कायिक होते हैं तथा ये वंशानुगत नहीं होते, केवल जननद्रव्य में पहुँचने वाले लक्षणों की ही वंशानुगति होती है।

जीवन की उत्पत्ति की आधुनिक संकल्पना (ओपैरिन परिकल्पना) पर टिप्पणी दीजिए। (2013)
या
जीवन के उद्भव की आधुनिक परिकल्पना का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति : ओपैरिन की आधुनिक परिकल्पना जीवन की उत्पत्ति के विषय में यह आधुनिकतम मत (संश्लेषणात्मक वाद) है। इस मत को और अधिक स्पष्ट रूप से रूसी वैज्ञानिक ओपैरिन (A. I. Oparin, 1924) ने प्रस्तुत किया। पदार्थवाद (materialistic theory) के रूप में प्रचलित अपने मत को ओपैरिन ने सन् 1936 में ‘जीवन की उत्पत्ति’ (The Origin of Life) नामक पुस्तके द्वारा प्रकाशित किया। उपर्युक्त परिकल्पना के अनुसार आधुनिक पृथ्वी के निर्माण एवं इस पर जीवन की उत्पत्ति की प्रक्रिया को निम्नलिखित आठ चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

1. परमाणु अवस्था प्रारम्भिक चरण में पृथ्वी आग का गोला थी, जिसमें सभी तत्त्व परमाणु के रूप में उपस्थित थे जो अपने घनत्व के अनुसार व्यवस्थित थे। भारी परमाणु; जैसे लोहा, निकिल आदि केन्द्र में और हल्के परमाणु; जैसे हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन आदि बाहर की ओर थे।

2. अणु अवस्था द्वितीय चरण में पृथ्वी का तापक्रम अपेक्षाकृत कम हो जाने के कारण स्वतन्त्र परमाणुओं का परस्पर संयोग सम्भव हुआ, जिसके फलस्वरूप अणुओं (molecules) की उत्पत्ति हुई। आदि वायुमण्डल अपचायक (reducing) था तथा इसमें हाइड्रोजन के परमाणु लगभग 90% थे। आदि वायुमण्डल में जल, वाष्प, अमोनिया व मेथेन गैसें अस्तित्व में आयीं। पृथ्वी का तापक्रम और ठण्डा होने पर जल – वाष्प ने बादलों एवं कोहरे का रूप लिया तथा पृथ्वी पर वर्षा के रूप में यह जल बरसने लगा; अतः धीरे – धीरे पृथ्वी की सतह पर झरनों, नदियों एवं समुद्रों की उत्पत्ति हुई। इन आदि स्रोतों के जल में आदि वायुमण्डल की गैसें; जैसे मेथेन (CH4) व अमोनिया (NH3) आदि घुले गयीं।

3. कार्बनिक यौगिकों का निर्माण आदि भूमण्डल पर सघन ज्वालामुखी थे, जिनसे निरन्तर लावा निष्कासित होता रहता था। लावा के धातु तत्त्वों ने आदि वायुमण्डल की नाइट्रोजन व कार्बन से संयोग कर नाइट्राइड्स व कार्बाइड्स बनाये, जिनसे भूपटल (earth’s crust) का निर्माण सम्भव हुआ। आदि वायुमण्डल में सर्वप्रथम मेथेन बनी तथा तापमान और कम होने पर। एथेन व प्रोपेन आदि बनीं। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों एवं ज्वालामुखी के तापक्रम आदि से प्राप्त ऊर्जा की उपस्थिति में उपर्युक्त अणुओं के संघनन एवं बहुलीकरण के फलस्वरूप जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ। इनमें शर्करायें, वसीय अम्ल, पिरीमिडीन, प्यूरीन तथा अमीनो अम्ल आदि मुख्य रूप से थे।

4. जटिल कार्बनिक अणुओं का निर्माण उबलते हुए गर्म समुद्र में तीसरे चरण के बने कार्बनिक यौगिक परस्पर क्रिया करके तथा जुड़ – जुड़ कर जटिल कार्बनिक यौगिक तथा उनके बहुलकों का निर्माण करते रहे। ये गर्म सूप में विभिन्न शर्कराओं से पॉलीसैकैराइड्स; जैसे स्टार्च (starch), सेल्युलोज (cellulose), ग्लिसरॉल (glycerol) आदि। विभिन्न वसीय अम्लों व ग्लिसरॉल से वसायें तथा अमीनो अम्लों से विभिन्न जटिल पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलायें तथा प्रोटीन्स (proteins), एन्जाइम्स आदि का निर्माण हुआ। विभिन्न क्षारकों; जैसे प्युरीन्स वे पिरिमिडीन्स ने शर्कराओं तथा फॉस्फेट्स के साथ मिलकर न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) तथा बाद में इनकी पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से न्यूक्लियक अम्लों का निर्माण हुआ। हेल्डेन (Haldane, 1929) ने आदि समुद्र में इस उबलते कार्बनिक पदार्थों के जलीय मिश्रण को ‘कार्बनिक यौगिकों का एक गर्म, पतला सूप’ या ‘पूर्वजीवी सूप’ (probiotic soup) कहा

5. कोलॉइड्स, कोएसरवेट्स एवं वैयक्तिकता आदि सागर के पूर्वजीवी सूप’ के विभिन्न यौगिकों के अणुओं में परस्पर प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप कोलॉइडल कण बने, जिनसे अघुलनशील बूंदों के रूप में कोलॉइडलीय तन्त्रों का निर्माण हुआ। प्रोटीन की कोलॉइडलीय बूंदों के विद्युतावेशित होने के कारण इनकी सतह पर जल की नन्हीं – नन्हीं बूंदें चिपक जाती थीं। इन्हें फॉक्स (Fox, 1958) द्वारा प्रोटीनॉइड माइक्रोस्फीयर्स कहा गया। इसके विपरीत विद्युतावेशित कोलॉइडलीय बूंदों के परस्पर संयोग से अपेक्षाकृत बड़े व घने कोलॉइडलीय यन्त्र बने, इन्हें ओपैरिन ने कोएसरवेट्स कहा। उन्होंने प्रयोगों द्वारा गोंद व जिलेटिन आदि से कृत्रिम कोएसरवेट्स बनाकर दिखाये।

कोएसरवेट्स के धातु तत्त्वों अथवा प्रोटीन्स ने विकर अथवा कार्बनिक उत्प्रेरकों का कार्य किया। इस प्रकार इनमें प्रारम्भिक जैविक क्रियाओं का उदय हुआ। अपने चिपचिपेपन की सामर्थ्य के आधार पर कोएसरवेट्स एक निश्चित आकारीय वृद्धि के पश्चात् छोटी-छोटी बूंदों में टूट जाते थे। इस प्रकार इनमें गुणन की क्रिया प्रारम्भ हुई। इसी तारतम्य में इन कोलॉइडलीय तन्त्रों में स्वउत्प्रेरक तन्त्र, जीन्स, विषाणु एवं प्रारम्भिक जीवन की उत्पत्ति हुई क्योंकि अब तक न्यूक्लियक अम्ल तथा प्रोटीन के मिलने से न्यूक्लियोप्रोटीन का निर्माण हो चुका था। न्यूक्लियोप्रोटीन एक ओर तो वर्तमान जीन्स के समान कार्य करते अथवा दूसरी ओर गुणन करके विषाणुओं (viruses) के समान विषाणुओं को ‘प्रारम्भिक जीव’ माना गया है।

6. असीमकेन्द्रकीय कोशिका की उत्पत्ति न्यूक्लियक अम्लों द्वारा अपने चारों ओर खाद्य पदार्थ एकत्र करके अथवा कोएसरवेट्स में उत्पत्ति द्वारा असीमकेन्द्रकीय कोशिकाओं (prokaryotic cells) का निर्माण हुआ, जीवाणु इसी प्रकार की कोशिकायें हैं जिनसे स्पष्ट केन्द्रक की कोशिकायें अर्थात् सुकेन्द्रकीय कोशिकायें (eukaryotic cells) बनी थीं।

7. स्वपोषण की उत्पत्ति आदि सागर में उत्पन्न असीम केन्द्रकीय कोशिकायें परपोषी थीं। धीरे – धीरे ये कोशिकायें आदि सागर में उपलब्ध सरल अकार्बनिक पदार्थों से जटिल कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण करने लगीं। यह स्वपोषण की दिशा को प्रथम चरण था। इसके बाद कोशिकाओं में मैग्नीशियम पोरफाइरिन्स से वर्तमान पर्णहरित के समान उत्प्रेरक उत्पन्न हुए। वर्तमान जीवाणु – पर्णहरित इसका उदाहरण है। इसकी सहायता से कोशिकायें सौर ऊर्जा से प्रकाश संश्लेषण करने लगीं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के परिणामस्वरूप वायुमण्डल में ऑक्सीजन का मुक्त होना, आदि जीवों के उविकास क्रम में एक क्रान्तिकारी घटना थी। पृथ्वी से लगभग 24 किमी ऊँचाई पर ओजोन का एक स्तर बन गया जो सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर पहुँचने से रोकने लगा।

8. सुकेन्द्रीय कोशिकाओं की उत्पत्ति आदि भूमण्डल लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व वायवीय अथवा ऑक्सी श्वसन के योग्य हो चुका था। इसके साथ ही आदि कोशिकाओं की रचना में क्रमिक विकास का क्रम प्रारम्भ हो गया। आदि सुकेन्द्रकीय कोशिकायें सामान्यतः दो प्रकार की थीं

क्लोरोप्लास्ट विहीन जन्तु कोशिकायें तथा
क्लोरोप्लास्ट युक्त पादप कोशिकायें।
इन दोनों प्रकार की कोशिकाओं ने सम्मिलित रूप से प्रकृति में जैव सन्तुलन की स्थापना की। इन्हीं कोशिकाओं के क्रमिक विकास के फलस्वरूप जन्तुओं एवं पादपों की वर्तमान जातियों का विकास हुआ है।
 प्रश्न 
मानव आनुवंशिकी से आप क्या समझते हैं? इसके जनक कौन थे? इसके क्या लाभ हैं? (2013)
उत्तर:
मानव आनुवंशिकी में मनुष्य के एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाने वाले लक्षणों या गुणों का अध्ययन किया जाता है। मानव आनुवंशिकी के जनक गाल्टन थे।

मानव आनुवंशिकी के लाभ (Advantages of Human Genetics) मानव आनुवंशिकी का अध्ययन मानव समाज के लिए अनेक प्रकार से लाभप्रद है। इसके द्वारा मानव संततियों में आने वाले रोगों के बारे में अध्ययन किया जाता है। इन रोगों के निदान के बारे में जानकारी प्राप्त कर, मनुष्य इनकी चिकित्सा पहले से ही कर सकता है। सुजननिकी (eugenics) द्वारा अच्छे लक्षणों की वंशागति के लिए समाज के आनुवंशिकी स्तर का अध्ययन किया जाता है।  इसके बाद निषेधात्मक (negative) अथवा स्वीकारात्मक (positive) विधियाँ काम में लायी जाती हैं, अर्थात् निम्नकोटि के आनुवंशिकी लक्षणों की वंशागति से व्यक्तियों को रोका जाता है अथवा उच्च कोटि के लक्षणों वाले व्यक्तियों को वंशागति के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। दोनों प्रकार की सुजननिकी. के लिए विभिन्न प्रकार की विधियाँ प्रयोग में लायी जाती हैं; जैसे- निषेधात्मक सुजननिकी के लिए वैवाहिक प्रतिबन्ध, बन्ध्यीकरण, सन्तति नियन्त्रण आदि के लिए गर्भपात इत्यादि तथा स्वीकारात्मक सुजननिकी के लिए उत्कृष्ट चयन, उच्च आनुवंशिक लक्षणों को अधिकाधिक उपयोग, उच्चकोटि के लक्षणों वाले पुरुष का वीर्य संचित करना तथा कृत्रिम गर्भाधान के लिए उसका उपयोग करना आदि।

यूथेनिक्स (euthenics) द्वारा पहले से ही वंशानुगत गुणों को अच्छा वातावरण प्रदान कर उपचारित किया जा सकता है। वर्तमान समय में जीन की खोजों के आधार पर अच्छे जीन को खराब जीन के स्थान पर बदला जा सकता है। इसको जीन सर्जरी तथा जीन इन्जीनियरिंग या जीन अभियान्त्रिकी (genic surgery and genetic engineering) कहा जाता है। इस प्रकार हम मानव आनुवंशिकता का अध्ययन करके एक सुदृढ़ मानव समाज की कल्पना कर सकते हैं, जिसमें कोई भी मनुष्य बीमार, निम्नस्तरीय अथवा बुद्धिहीन उत्पन्न नहीं होगा।

 आनुवंशिकी के गुणसूत्र सिद्धान्त का वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
इस सिद्धान्त के अनुसार।

सभी जीवों में प्रत्येक लक्षण के लिए कम – से – कम एक जोड़ी जीन या कारक अवश्य होते हैं।
आनुवंशिक लक्षणों के जीन या आनुवंशिक कारक गुणसूत्रों पर पंक्तिबद्ध होते हैं और गुणसूत्रों के साथ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते हैं।
बहुकोशिकीय जीवों में जनने कोशिकाओं के माध्यम से विभिन्न पीढ़ियों में जैविक सम्बन्ध स्थापित रहता है। इसका अर्थ है कि आनुवंशिक लक्षणों के जीन जनन कोशिकाओं या युग्मकों द्वारा दूसरी पीढ़ी के जीवों में पहुँचते हैं।
किसी जीव के लक्षणों में शुक्राणु व अण्डाणु दोनों ही का बराबर का योगदान होता है।
युग्मक निर्माण के समय अर्धसूत्री विभाजन में गुणसूत्रों के व्यवहार से प्रमाणित होता है कि जीन गुणसूत्रों पर होते हैं।
जीवों की प्रत्येक कोशिका में गुणसूत्र जोड़ों में मिलते हैं किन्तु युग्मकों में प्रत्येक गुणसूत्र – युग्म में से केवल एक गुणसूत्र होता है।
अगुणित शुक्राणु व अण्डाणु के संलयन से बना युग्मज द्विगुणित होता है जिससे पूर्ण जीव का विकास होता है।

 जैव विकास के सम्बन्ध में डार्विन का सिद्धान्त या डार्विनवाद
चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin, 1809 – 1882) एक अंग्रेज जीव वैज्ञानिक थे। डार्विन ने समुद्री यात्राओं द्वारा विभिन्न देशों तथा द्वीपों के जीवों का अध्ययन किया और जीवों के विकास के सम्बन्ध में अपने सिद्धान्त को “प्राकृतिक वरण द्वारा जातियों का उद्भव” (Origin of Species by Natural Selection) नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। डार्विन का सिद्धान्त प्राकृतिक वरणवाद या डार्विनवाद (theory of natural selection or Darwinism) के नाम से प्रचलित है। यह सिद्धान्त निम्नलिखित तथ्यों को आधार मानकर प्रतिपादित किया गया।

1. जीवों में सन्तानोत्पत्ति की प्रचुर क्षमता प्रत्येक जीव प्रजनन द्वारा अपनी सन्तान उत्पन्न करता है। जीवों में सन्तान उत्पन्न करने की बहुत अधिक क्षमता होती है। निम्न श्रेणी के जन्तुओं में तो प्रजनन क्षमता इतनी अधिक होती है कि अगर सभी सन्ताने जीवित रहें, तो पृथ्वी पर उनके सिवा और कोई जन्तु दिखाई भी न देगा, परन्तु ऐसा नहीं होता। जीवों की संख्या की वृद्धि इस प्रकार रेखागणितीय अनुपात में हो सकती है।

2. जीवन संघर्ष सभी जीवों को जीवित रहने के लिए स्थान, प्रकाश तथा भोजन चाहिए, परन्तु सीमित स्थान तथा भोजन के कारण यह सम्भव नहीं हो पाता। अत: पैदा होते ही प्रत्येक जीव को जीवित रहने की आवश्यक सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इसको जीवन संघर्ष कहते हैं। इसे जीवन संघर्ष के कारण ही रेखागणितीय अनुपात में बढ़ती जनसंख्या स्थिर रहती है। एक ही जाति के जीवों के मध्य होने वाला जीवन संघर्ष सबसे अधिक घातक होता है।

3. योग्यतम की उत्तरजीविता वही जीव जीवित रहता है, जो जीवन संघर्ष में वातावरण के अनुकूल होता है और आवश्यकतानुसार परिवर्तन करके स्वयं को और अधिक अनुकूल बना लेता है। अनुकूलन से वह सशक्त हो जाता है। संघर्ष में निर्बल जीव नष्ट हो जाते हैं अर्थात् योग्यतम ही जीवित रहता है। इस प्रकार प्रत्येक जाति के जीवों की संख्या लगभग स्थिर बनी रहती है।

4. प्राकृतिक वरण जीवित रहने के लिए जीवों में जो संघर्ष होता है, इसमें जो जीव प्राकृतिक वातावरण के अनुकूल होते हैं, वे ही जीवित रहते हैं तथा अन्य नष्ट हो जाते हैं। अतः प्रकृति स्वयं ही श्रेष्ठ व अनुकूल जीवों का वरण करती है, जिसको प्राकृतिक वरण कहते हैं।

5. विभिन्नतायें प्रत्येक जाति के जीवों में विभिन्नतायें मिलती हैं। इन्हीं विभिन्नताओं के कारण कुछ जीव वातावरण के अनुकूल होते हैं। जो विभिन्नतायें उत्पन्न होती हैं, वे सन्तानों में वंशानुगत हो जाती हैं, जिससे सन्तान भी उस वातावरण के लिए अनुकूलित हो जाती है। यहाँ यह भी माना गया है। कि विभिन्नतायें लाभदायक अथवा हानिकारक हो सकती हैं। लाभदायक अथवा उपयोगी विभिन्नतायें ही जीव को योग्य बनाने में सक्षम होती हैं तथा उस जीव को जीवित रहने में सहायता करती हैं।

6. नयी जातियों की उत्पत्ति जीवन संघर्ष में योग्य सिद्ध करने के लिए उत्पन्न विभिन्नतायें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशानुगत होती रहती हैं, साथ – ही – साथ सन्तान में भी स्वयं कुछ विशेष लक्षण तथा विभिन्नतायें उत्पन्न हो जाती हैं। कुछ पीढ़ियों के बाद लक्षणों तथा विभिन्नताओं की वंशागति इतनी अधिक हो जाती है कि सन्तानें अपने पूर्वजों से भिन्न हो जाती हैं और इस तरह नयी जातियों की उत्पत्ति हो जाती हैं।


  लैमार्कवाद को समझाइए। लैमार्कवाद की आलोचनाओं पर प्रकाश डालिए। (2013, 15, 17)
या
उपार्जित लक्षणों की वंशागति का सिद्धान्त क्या है? (2012)
उत्तर:
लैमार्कवाद
जैव विकास के प्रचलित सिद्धान्तों में यह सबसे पुराना सिद्धान्त है। लैमार्क (1744 – 1829) एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक थे। इन्होंने 1809 ई० में जैव विकास के बारे में अपने सिद्धान्त को फिलोसॉफी जुलोजिक (Philosophie Zollogique) नामक पुस्तक में प्रकाशित कराया। उनका सिद्धान्त लैमार्कवाद (Lamarckism) के नाम से प्रचलित हुआ। इन्होंने मुख्यत: चार बातों पर प्रकाश डाला-

1. जीवों की आकार में वृद्धि की प्रवृत्ति जीवों में उनके शरीर अथवा विभिन्न अंगों के आकार में वृद्धि करते रहने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है।

2. वातावरण का प्रभाव वातावरण के परिवर्तन के अनुसार जीव स्वयं को अनुकूल बनाने के लिए अपने शरीर की संरचना तथा आदतों में परिवर्तन कर लेता है। इस प्रकार के प्रभावों से उसके कुछ अंगों का उपयोग बढ़ सकता है, अन्य का अपेक्षाकृत कम हो जाता है। इस प्रकार उसके शरीर की रचना में परिवर्तन आ जाते हैं।

3. अंगों का उपयोग और अनुपयोग वातावरण में किसी अंग के उपयोग की अधिक आवश्यकता हो जाती है, तो वह अंग अधिकाधिक पुष्ट तथा विकसित हो जाता है। इसके विपरीत जो अंग कम प्रयोग में आता है, वह धीरे-धीरे क्षीण हो जाता है और अन्त में लुप्त हो जाता है या अवशेषी अंग (vestigeal organ) का रूप ले लेता है।

4. उपार्जित लक्षणों की वंशागति वातावरण के प्रभाव से शारीरिक अंगों के लगातार उपयोग या अनुपयोग से जो नये परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, उन्हें उपार्जित लक्षण (acquired character) कहते हैं। ये लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँच जाते हैं। यदि उपार्जित लक्षणों की वंशागति का क्रम चलता रहे, तो सन्तानों में नये परिवर्तन स्थायी तथा नये लक्षण विकसित हो जायेंगे। इस प्रकार बनने वाली सन्तति अपने पूर्वजों से पूर्णतया भिन्न हो जायेगी और इस तरह नयी जाति का निर्माण हो जायेगा। अपने सिद्धान्त के समर्थन में लैमार्क ने जिराफ का उदाहरण दिया है। जिराफ दक्षिण अफ्रीका के रेगिस्तान में मिलते हैं। इनकी गर्दन तथा अगली टाँगें अधिक लम्बी होती हैं, जिनकी सहायता से ये ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। लैमार्क के अनुसार जिराफ के पूर्वज आकार में अपेक्षाकृत छोटे थे, उनकी गर्दन कम लम्बी तथा अगली टाँगें पिछली टाँगों के बराबर लम्बी थीं।

ये ऐसे युग में रहते थे, जब अफ्रीका की जलवायु इतनी गर्म तथा रेगिस्तानी नहीं थी। वहाँ घास के मैदाने थे जिनमें वे चरते रहते थे। धीरे – धीरे यहाँ की जलवायु शुष्क तथा रेगिस्तानी होने लगी। घास के मैदान लुप्त होते गये। अत: उन्हें गर्दन तथा अगली टाँगों को उचका – उचकाकर ऊँचे – ऊँचे वृक्षों की पत्तियाँ खाने के लिए विवश होना पड़ा। इस प्रकार गर्दन तथा अगली टाँगों के निरन्तर अधिक उपयोग करने के कारण दोनों ही अंगों की लम्बाई बढ़ती गयी।  यह उपार्जित लक्षण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में वंशागत होते रहे और अन्त में जिराफ की वर्तमान जाति के स्थायी लक्षण बन गये। . एक अन्य उदाहरण में उन्होंने बताया कि सर्प का शरीर लम्बा होने के कारण उसे झाड़ियों आदि में घुसने में उसकी टाँगें असुविधाजनक थीं। इस प्रकार उसने टाँगों का उपयोग करना बन्द कर दिया। धीरे-धीरे उसकी टाँगें अनुपयुक्त होकर विलुप्त हो गई और वर्तमान बिना टाँगों वाली सर्यों की जातियाँ विकसित हुईं।

लैमार्कवाद की आलोचना
लैमार्कवाद के जैव विकास सम्बन्धी विचारों में अंगों के उपयोग – अनुपयोग की बात कही गई है, साथ ही इनसे उपार्जित लक्षणों को वंशानुगत लक्षण मान लिया गया है। वैज्ञानिकों ने अप्रमाणिकता के आधार पर इस विचार को पूर्णतः अस्वीकार कर दिया। इस आधार पर तो पहलवान का बच्चा पहलवान, अन्धे माता – पिता का बच्चा अन्धा होना चाहिए। एक लोहार के बराबर लोहा पीटते रहने से, उसके हाथ की पेशियाँ अत्यधिक मजबूत हो जाती हैं, किन्तु उसका यह लक्षण उसकी सन्तान में नहीं आता।

वीजमान (Wiesmann) नामक जर्मन वैज्ञानिक ने लैमार्कवाद का अत्यधिक विरोध किया। उन्होंने चूहों पर अनेक प्रयोग किये। एक प्रयोग में कई पीढ़ियों तक वे चूहों की पूँछ काटते रहे, किन्तु उन्हें अन्त तक एक भी पूँछ कटा चूहा प्राप्त नहीं हो सका। किसी भी सन्तति में चूहे की पूँछ उतनी ही लम्बी, मोटी तथा मजबूत मिली जितनी से उन्होंने अपने प्रयोग आरम्भ किये थे। लैमार्क के अनुसार तो अन्तिम पीढ़ी में प्राप्त चूहे बिना पूंछ वाले उत्पन्न होने चाहिए थे। वीजमान का मानना था कि अंगों में उपार्जित होने वाले लक्षण कायिक होते हैं तथा ये वंशानुगत नहीं होते, केवल जननद्रव्य में पहुँचने वाले लक्षणों की ही वंशानुगति होती है।

 जीवन की उत्पत्ति की आधुनिक संकल्पना (ओपैरिन परिकल्पना) पर टिप्पणी दीजिए। (2013)
या
जीवन के उद्भव की आधुनिक परिकल्पना का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए। (2017)
उत्तर:
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति : ओपैरिन की आधुनिक परिकल्पना जीवन की उत्पत्ति के विषय में यह आधुनिकतम मत (संश्लेषणात्मक वाद) है। इस मत को और अधिक स्पष्ट रूप से रूसी वैज्ञानिक ओपैरिन (A. I. Oparin, 1924) ने प्रस्तुत किया। पदार्थवाद (materialistic theory) के रूप में प्रचलित अपने मत को ओपैरिन ने सन् 1936 में ‘जीवन की उत्पत्ति’ (The Origin of Life) नामक पुस्तके द्वारा प्रकाशित किया। उपर्युक्त परिकल्पना के अनुसार आधुनिक पृथ्वी के निर्माण एवं इस पर जीवन की उत्पत्ति की प्रक्रिया को निम्नलिखित आठ चरणों में विभाजित किया जा सकता है।

1. परमाणु अवस्था प्रारम्भिक चरण में पृथ्वी आग का गोला थी, जिसमें सभी तत्त्व परमाणु के रूप में उपस्थित थे जो अपने घनत्व के अनुसार व्यवस्थित थे। भारी परमाणु; जैसे लोहा, निकिल आदि केन्द्र में और हल्के परमाणु; जैसे हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, कार्बन, ऑक्सीजन आदि बाहर की ओर थे।

2. अणु अवस्था द्वितीय चरण में पृथ्वी का तापक्रम अपेक्षाकृत कम हो जाने के कारण स्वतन्त्र परमाणुओं का परस्पर संयोग सम्भव हुआ, जिसके फलस्वरूप अणुओं (molecules) की उत्पत्ति हुई। आदि वायुमण्डल अपचायक (reducing) था तथा इसमें हाइड्रोजन के परमाणु लगभग 90% थे। आदि वायुमण्डल में जल, वाष्प, अमोनिया व मेथेन गैसें अस्तित्व में आयीं। पृथ्वी का तापक्रम और ठण्डा होने पर जल – वाष्प ने बादलों एवं कोहरे का रूप लिया तथा पृथ्वी पर वर्षा के रूप में यह जल बरसने लगा; अतः धीरे – धीरे पृथ्वी की सतह पर झरनों, नदियों एवं समुद्रों की उत्पत्ति हुई। इन आदि स्रोतों के जल में आदि वायुमण्डल की गैसें; जैसे मेथेन (CH4) व अमोनिया (NH3) आदि घुले गयीं।

3. कार्बनिक यौगिकों का निर्माण आदि भूमण्डल पर सघन ज्वालामुखी थे, जिनसे निरन्तर लावा निष्कासित होता रहता था। लावा के धातु तत्त्वों ने आदि वायुमण्डल की नाइट्रोजन व कार्बन से संयोग कर नाइट्राइड्स व कार्बाइड्स बनाये, जिनसे भूपटल (earth’s crust) का निर्माण सम्भव हुआ। आदि वायुमण्डल में सर्वप्रथम मेथेन बनी तथा तापमान और कम होने पर। एथेन व प्रोपेन आदि बनीं। इस समय सूर्य की पराबैंगनी किरणों, कॉस्मिक किरणों एवं ज्वालामुखी के तापक्रम आदि से प्राप्त ऊर्जा की उपस्थिति में उपर्युक्त अणुओं के संघनन एवं बहुलीकरण के फलस्वरूप जटिल कार्बनिक यौगिकों का निर्माण हुआ। इनमें शर्करायें, वसीय अम्ल, पिरीमिडीन, प्यूरीन तथा अमीनो अम्ल आदि मुख्य रूप से थे।

4. जटिल कार्बनिक अणुओं का निर्माण उबलते हुए गर्म समुद्र में तीसरे चरण के बने कार्बनिक यौगिक परस्पर क्रिया करके तथा जुड़ – जुड़ कर जटिल कार्बनिक यौगिक तथा उनके बहुलकों का निर्माण करते रहे। ये गर्म सूप में विभिन्न शर्कराओं से पॉलीसैकैराइड्स; जैसे स्टार्च (starch), सेल्युलोज (cellulose), ग्लिसरॉल (glycerol) आदि। विभिन्न वसीय अम्लों व ग्लिसरॉल से वसायें तथा अमीनो अम्लों से विभिन्न जटिल पॉलीपेप्टाइड श्रृंखलायें तथा प्रोटीन्स (proteins), एन्जाइम्स आदि का निर्माण हुआ। विभिन्न क्षारकों; जैसे प्युरीन्स वे पिरिमिडीन्स ने शर्कराओं तथा फॉस्फेट्स के साथ मिलकर न्यूक्लियोटाइड्स (nucleotides) तथा बाद में इनकी पॉलीन्यूक्लियोटाइड श्रृंखलाओं से न्यूक्लियक अम्लों का निर्माण हुआ। हेल्डेन (Haldane, 1929) ने आदि समुद्र में इस उबलते कार्बनिक पदार्थों के जलीय मिश्रण को ‘कार्बनिक यौगिकों का एक गर्म, पतला सूप’ या ‘पूर्वजीवी सूप’ (probiotic soup) कहा

5. कोलॉइड्स, कोएसरवेट्स एवं वैयक्तिकता आदि सागर के पूर्वजीवी सूप’ के विभिन्न यौगिकों के अणुओं में परस्पर प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप कोलॉइडल कण बने, जिनसे अघुलनशील बूंदों के रूप में कोलॉइडलीय तन्त्रों का निर्माण हुआ। प्रोटीन की कोलॉइडलीय बूंदों के विद्युतावेशित होने के कारण इनकी सतह पर जल की नन्हीं – नन्हीं बूंदें चिपक जाती थीं। इन्हें फॉक्स (Fox, 1958) द्वारा प्रोटीनॉइड माइक्रोस्फीयर्स कहा गया। इसके विपरीत विद्युतावेशित कोलॉइडलीय बूंदों के परस्पर संयोग से अपेक्षाकृत बड़े व घने कोलॉइडलीय यन्त्र बने, इन्हें ओपैरिन ने कोएसरवेट्स कहा। उन्होंने प्रयोगों द्वारा गोंद व जिलेटिन आदि से कृत्रिम कोएसरवेट्स बनाकर दिखाये।

कोएसरवेट्स के धातु तत्त्वों अथवा प्रोटीन्स ने विकर अथवा कार्बनिक उत्प्रेरकों का कार्य किया। इस प्रकार इनमें प्रारम्भिक जैविक क्रियाओं का उदय हुआ। अपने चिपचिपेपन की सामर्थ्य के आधार पर कोएसरवेट्स एक निश्चित आकारीय वृद्धि के पश्चात् छोटी-छोटी बूंदों में टूट जाते थे। इस प्रकार इनमें गुणन की क्रिया प्रारम्भ हुई। इसी तारतम्य में इन कोलॉइडलीय तन्त्रों में स्वउत्प्रेरक तन्त्र, जीन्स, विषाणु एवं प्रारम्भिक जीवन की उत्पत्ति हुई क्योंकि अब तक न्यूक्लियक अम्ल तथा प्रोटीन के मिलने से न्यूक्लियोप्रोटीन का निर्माण हो चुका था। न्यूक्लियोप्रोटीन एक ओर तो वर्तमान जीन्स के समान कार्य करते अथवा दूसरी ओर गुणन करके विषाणुओं (viruses) के समान विषाणुओं को ‘प्रारम्भिक जीव’ माना गया है।

6. असीमकेन्द्रकीय कोशिका की उत्पत्ति न्यूक्लियक अम्लों द्वारा अपने चारों ओर खाद्य पदार्थ एकत्र करके अथवा कोएसरवेट्स में उत्पत्ति द्वारा असीमकेन्द्रकीय कोशिकाओं (prokaryotic cells) का निर्माण हुआ, जीवाणु इसी प्रकार की कोशिकायें हैं जिनसे स्पष्ट केन्द्रक की कोशिकायें अर्थात् सुकेन्द्रकीय कोशिकायें (eukaryotic cells) बनी थीं।

7. स्वपोषण की उत्पत्ति आदि सागर में उत्पन्न असीम केन्द्रकीय कोशिकायें परपोषी थीं। धीरे – धीरे ये कोशिकायें आदि सागर में उपलब्ध सरल अकार्बनिक पदार्थों से जटिल कार्बनिक पदार्थों का संश्लेषण करने लगीं। यह स्वपोषण की दिशा को प्रथम चरण था। इसके बाद कोशिकाओं में मैग्नीशियम पोरफाइरिन्स से वर्तमान पर्णहरित के समान उत्प्रेरक उत्पन्न हुए। वर्तमान जीवाणु – पर्णहरित इसका उदाहरण है। इसकी सहायता से कोशिकायें सौर ऊर्जा से प्रकाश संश्लेषण करने लगीं। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया के परिणामस्वरूप वायुमण्डल में ऑक्सीजन का मुक्त होना, आदि जीवों के उविकास क्रम में एक क्रान्तिकारी घटना थी। पृथ्वी से लगभग 24 किमी ऊँचाई पर ओजोन का एक स्तर बन गया जो सूर्य के प्रकाश की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर पहुँचने से रोकने लगा।

8. सुकेन्द्रीय कोशिकाओं की उत्पत्ति आदि भूमण्डल लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व वायवीय अथवा ऑक्सी श्वसन के योग्य हो चुका था। इसके साथ ही आदि कोशिकाओं की रचना में क्रमिक विकास का क्रम प्रारम्भ हो गया। आदि सुकेन्द्रकीय कोशिकायें सामान्यतः दो प्रकार की थीं

क्लोरोप्लास्ट विहीन जन्तु कोशिकायें तथा
क्लोरोप्लास्ट युक्त पादप कोशिकायें।
इन दोनों प्रकार की कोशिकाओं ने सम्मिलित रूप से प्रकृति में जैव सन्तुलन की स्थापना की। इन्हीं कोशिकाओं के क्रमिक विकास के फलस्वरूप जन्तुओं एवं पादपों की वर्तमान जातियों का विकास हुआ है।

स्टैनले मिलर के प्रयोग का सचित्र वर्णन कीजिए। (2011, 12, 13, 17)
उत्तर:
वैज्ञानिक जे०बी०एस० हाल्डेन ने 1929 ई. में सुझाव दिया कि जीवों की सर्वप्रथम उत्पत्ति उन सरल अकार्बनिक अणुओं से ही हुई होगी जो पृथ्वी की उत्पत्ति के समय बने थे। स्टेनले मिलर तथा हेराल्ड सी० यूरे ने 1953 ई. में प्रयोग किए और प्रमाण दिए कि सरल अकार्बनिक अणुओं से कार्बनिक अणु उत्पन्न हो सकते हैं। उन्होंने ऐसे वातावरण का निर्माण किया जो सम्भवतः प्राथमिक वातावरण के समान था। जिसमें अमोनिया, मीथेन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S) गैसें तो थीं परन्तु स्वतन्त्र ऑक्सीजन नहीं थी। पात्र में जल भी था। इस सम्मिश्रण को 100°C से कुछ कम ताप पर रखा गया। गैसों के इस मिश्रण में कृत्रिम रूप से समय – समय पर चिंगारियाँ उत्पन्न की गईं; जैसे किआकाश में तड़ित बिजली उत्पन्न होती है

इसप्रयोग में देखा गया कि 15% मीथेन का कार्बन उपयोग हुआ और सरले अकार्बनिक यौगिकों में परिवर्तित हो गया। इन अकार्बनिक यौगिकों में विभिन्न, अमीनो अम्ल भी संश्लेषित हुए जो कि प्रोटीन के अणुओं के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। उपर्युक्त प्रमाण के आधार पर हम परिकल्पना कर सकते हैं कि शायद जीवन की उत्पत्ति अजैविक पदार्थों से हुई है

अतिलघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आनुवंशिकता की खोज करने वाले वैज्ञानिक का पूरा नाम बताइये।
या
आनुवंशिकता के जनक का नाम बताइये।
या
आनुवंशिकता के जन्मदाता कौन थे? (2012, 13)
उत्तर:
ग्रेगर जॉन मेण्डल।

प्रश्न 2.
मेण्डल ने आनुवंशिकता का प्रयोग किस पौधे पर किया था? उसका वैज्ञानिक नाम लिखिए। (2018)
उत्तर:
मटर। वैज्ञानिक नाम – पाइसम सटाइवम (Pisum sativum)

प्रश्न 3.
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को क्यों चुना? (2017)
उत्तर:
मेण्डल ने अपने प्रयोग के लिए मटर के पौधे को चुना; क्योकि
मटर कम समय में ही उगने वाला पौधा है जिसे आसानी से उगाया जा सकता है तथा इसमें स्वपरागण के फलस्वरूप अनेक बीज बनाने की समान क्षमता है।
मटर में विभिन्न – विभिन्न लक्षणों वाली प्रजातियाँ सरलता से मिल जाती हैं तथा ये विभिन्न पर्यावरणीय परिस्थितियों में भी सामान्य प्रजनन क्षमता रखती हैं।

प्रश्न 4.
प्रभावी तथा अप्रभावी लक्षणों से आप क्या समझते हैं? (2017)
उत्तर:
एक लक्षण के दो कारकों में जो अपना प्रभाव प्रदर्शित करता है वह प्रभावी लक्षण कहलाता है जबकि दूसरा जो होते हुए भी अपने प्रभाव को प्रदर्शित नहीं कर पाता, उसे अप्रभावी लक्षण कहते हैं।

प्रश्न 5.
लक्षणरूपी 9 : 3 : 3 : 1 मेण्डल के किस नियम का प्रतिपादन करता है?
उत्तर:
स्वतन्त्र अपव्यूहन के नियम का।

प्रश्न 6.
मनुष्य के नर तथा मादा गुणसूत्रों को प्रदर्शित कीजिए।
उत्तर:
नर गुणसूत्र = 22 + XY तथा
मादा गुणसूत्र = 22 + XX गुणसूत्र।

प्रश्न 7.
यदि किसी जीव की कोशिकाओं में गुणसूत्रों की संख्या 20 है, तो उसकी जनन कोशिकाओं में कितने गुणसूत्र होंगे?
उत्तर:
जनन कोशिका अर्थात् युग्मकों में n = 10 गुणसूत्र होंगे।

प्रश्न 8.
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में डी०एन०ए० कहाँ पाया जाता है? (2013)
उत्तर:
प्रोकैरियोटिक कोशिकाओं में डी०एन०ए० एक गुणसूत्र के रूप में कोशिकाद्रव्य में पड़ा रहता है।

प्रश्न 9.
आनुवंशिक रोग किसे कहते हैं?
उत्तर:
जो रोग आनुवंशिक विशेषकों की त्रुटिपूर्ण संख्या, प्रभावी या अप्रभावी स्वरूप आदि के कारण पीढ़ी – दर – पीढ़ी वंशानुगत होते रहते हैं, उन्हें आनुवंशिक रोग कहते हैं।

प्रश्न 10.
किस आनुवंशिक लक्षण के जीन्स X गुणसूत्रों पर पाये जाते हैं? (2011)
उत्तर:
वर्णान्धता।

प्रश्न 11.
यदि किसी व्यक्ति को हल्की चोट लगने पर भी रक्तस्राव नहीं रुकता तो उसे कौन – सा रोग हो सकता है?
उत्तर:
उसे हीमोफीलिया रोग है।

प्रश्न 12.
लिंग सहलग्नता से सम्बन्धित किन्हीं दो बीमारियों के नाम लिखिए। (2013, 15, 18)
उत्तर:
हीमोफीलिया तथा वर्णान्धता लिंग सहलग्न रोग हैं।

प्रश्न 13.
एक व्यक्ति हीमोफीलिया का रोगी है और उसकी पत्नि में हीमोफीलिया का एक जीन है। उस दंपत्ति के बच्चों में रोग से ग्रसित होने की संभावना क्या होगी? (2013)
उत्तर:
50%

प्रश्न 14.
यदि किसी बच्चे में 46 के स्थान पर 47 गुणसूत्र हों, तो उस बच्चे में किस प्रकार के रोग होने की सम्भावना है?
या
एक बच्चे में 47 गुणसूत्र हैं। उसे किस रोग की सम्भावना है?
उत्तर:
उसे मंगोली जड़ता रोग हो सकता है। इस प्रकार का दोष डाउन संलक्षण (Down’s syndrome) कहलाता है।

प्रश्न 15.
मानवे आनुवंशिकी विशेषकों से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
मनुष्य में जो लक्षण वंशानुगत होते हैं उन्हें मानव आनुवंशिकी विशेषक कहते हैं।

प्रश्न 16.
स्वत: जनन सिद्धान्त में विश्वास रखने वाले किसी एक वैज्ञानिक का नाम बताइये।
या
स्वतः जननवाद मत के प्रवर्तक का नाम लिखिये।
उत्तर:
स्वत: जनन सिद्धान्त में बैप्टिस्ट वॉन हेलमॉण्ट (1652) का विश्वास था।

प्रश्न 17.
मिलर ने अपने प्रयोग में कौन – कौन सी गैसों का मिश्रण लिया?
उत्तर:
मिलर ने अपने प्रयोग में मेथेन (CH4), अमोनिया (NH3), हाइड्रोजन (H2) तथा जलवाष्प (H2O) गैसें लीं।







No comments:

Post a Comment