जीवो को जीवित रहने के लिए अनेक शारिरिक क्रियायें सम्पादित करनी होती है जैसे एक कोशिकीय जीवो में
वृद्धि( grouth)
गति(movement)क
पोषण(nuterition)
श्वसन(respiratio)
जनन(reproduction)
उत्सर्जन(excretion)
लेकिन बहुकोशिकीय प्रणियों में ये और अधिक जटिल क्रियायें भी होती हैं जैसे
रूधिर परिवहन(blood transportation)
तन्त्रिका समन्वय(nervous coordination)
पोषण-जीवो द्वारा ग्रहण किया गया भोजन विभिन्न अंगो और एन्जाइम की सहायता से जटिल अणुओं से सरल अणुओं में टूट जाता है जिसे पाचन या digestion कहते हैं
आहारनाल-( alimentary canal)
Saliva contains the enzyme amylase, also called ptyalin, which is capable of breaking down starch into simpler sugars such as maltose and dextrin that can be further broken down in the small intestine.
आमाशय, ग्रास नली और छोटी आंत के बीच में स्थित होता है
आमाशय प्रोटीज़ (पेप्सिन जैसे प्रोटीन-पाचक एन्ज़ाइम) और हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मुक्त करता है, जो जीवाणुओं को मारते या रोकते हैं और प्रोटीज़ों को काम करने के लिए अम्लीय pH उपलब्ध कराते हैं। आमाशय द्वारा बुध्न[3] और आमाशय के ढांचे के इर्द-गिर्द लिपटने से पहले, बुध्न की मात्रा को कम करते हुए - दीवार की मांसपेशियों के संकुचन के माध्यम से भोजन का मंथन किया जाता है, जब पिंड अम्लान्न (आंशिक रूप से पचा हुआ आहार) में परिवर्तित होता है। अम्लान्न धीरे-धीरे जठरनिर्गम संकोची के माध्यम से गुजरता है और ग्रहणी में पहुंचता है, जहां पोषक तत्वों की निकासी शुरू होती है। मात्रा और आहार-सामग्री के आधार पर, आमाशय भोजन को 40 मिनट से लेकर कुछ घंटों के बीच अम्लान्न के रूप में पचाता है।
यकॄत (liver) मनुष्य के शरीर की सबसे बड़ी ग्रंथि है जिसका वयस्क में भार लगभग 1-2 से 1-5 किलोग्राम होता है। यह उदर में मध्यपट के ठीक नीचे स्थित होता है और इसकी दो पालियाँ ;(lobes) होती हैं। यकॄत पालिकाएं यकॄत की संरचनात्मक और कार्यात्मक इकाइयां हैं जिनके अंदर यकॄत कोशिकाएं रज्जु की तरह व्यवस्थित रहती हैं। प्रत्येक पालिका संयोजी ऊ तक की एक पतली परत से ढकी होती है जिसे ग्लिसंस केपसूल कहते हैं। यकॄत की कोशिकाओं से पित्त का स्राव होता है जो यकॄत नलिका से होते हुए एक पतली पेशीय थैली- पित्ताशय में सांद्रित एवं जमा होता है। पित्ताशय की नलिका यकॄतीय नलिका से मिलकर एक मूल पित्त वाहिनी बनाती है ;चित्र द्वारा-विजय-मित्र :-6। पित्ताशयी नलिका एवं अग्नाशयी नलिका, दोनों मिलकर यकॄत अग्नाशयी वाहिनी द्वारा ग्रहणी में खुलती है जो ओडी अवरोधिनी से नियंत्रित होती हैं।
liver_pittashay
अग्नाशय U आकार के ग्रहणी के बीच स्थित एक लंबी ग्रंथि है जो बहि: स्रावी और अंत: स्रावी, दोनों ही ग्रंथियों की तरह कार्य करती है। बहि: स्रावी भाग से क्षारीय अग्नाशयी स्राव निकलता है, जिसमें एंजाइम होते हैं और अंत: स्रावी भाग से इंसुलिन और ग्लुकेगोन नामक हार्मोन का स्राव होता है।
2 भोजन का पाचन
पाचन की प्रक्रिया यांत्रिक एवं रासायनिक विधियों द्वारा संपन्न होती है। मुखगुहा के मुख्यत: दो प्रकार्य हैं, भोजन का चर्वण और निगलने की क्रिया। लार की मदद से दांत और जिह्वा भोजन को अच्छी तरह चबाने एवं मिलाने का कार्य करते हैं। लार का श्लेष्म भोजन कणों को चिपकाने एवं उन्हें बोलस में रूपांतरित करने में मदद करता है। इसके उपरांत निगलने की क्रिया द्वारा बोलस ग्रसनी से ग्रसिका में चला जाता है। बोलस पेशीय संकुचन के क्रमाकुंचन (peristalsis) द्वारा ग्रसिका में आगे बढ़ता है। जठर-ग्रसिका अवरोधिनी भोजन के अमाशय में प्रवेश को नियंत्रित करती है। लार ;मुखगुहा में विद्युत-अपघट्य (electrolytes) (Na+, K+, Cl-, HCO3) और एंजाइम ;लार एमाइलेज या टायलिन तथा लाइसोजाइम होते हैं। पाचन की रासायनिक प्रक्रिया मुखगुहा में कार्बोहाइड्रेट को जल अपघटित करने वाली एंजाइम टायलिन या लार एमाइलेज की सक्रियता से प्रारंभ होती है। लगभग 30 प्रतिशत स्टार्च इसी एंजाइम की सक्रियता (pH 6-8) से द्विशर्करा माल्टोज में अपघटित होती है। लार में उपस्थित लाइसोजाइम जीवाणुओं के संक्रमण को रोकता है।
लार एमाइलेज
स्टार्च————————> माल्टोज
(pH 6-8)
आमाशय की म्यूकोसा में जठर ग्रंथियाँ स्थित होती हैं। जठर ग्रंथियों में मुख्य रूप से तीन प्रकार की कोशिकाएं होती हैं, यथा-
(i) म्यूकस का स्राव करने वाली श्लेषमा ग्रीवा कोशिकाएं
(ii) पेप्टिक या मुख्य कोशिकाएं जो प्रोएंजाइम पेप्सिनोजेन का स्राव करती हैं तथा;
(iii) भित्तीय या ऑक्सिन्टिक कोशिकाएं जो हाइड्राक्लोरिक अम्ल और नैज कारक स्रावित करती हैं ;नैज कारक विटामिन B12 के अवशोषण के लिए आवश्यक है।
अमाशय 4-5 घंटे तक भोजन का संग्रहण करता है। आमाशय की पेशीय दीवार के संकुचन द्वारा भोजन अम्लीय जठर रस से पूरी तरह मिल जाता है जिसे काइम (chyme) कहते हैं।
प्रोएंजाइम पेप्सिनोजेन हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के संपर्क में आने से सक्रिय एंजाइम पेप्सिन में परिवर्तित हो जाता है जो आमाशय का प्रोटीन-अपघटनीय एंजाइम है। पेप्सिन प्रोटीनों को प्रोटियोज तथा पेप्टोंस ;पेप्टाइडों में बदल देता है। जठर रस में उपस्थित श्लेष्म एवं बाइकार्बोनेट श्लेष्म उपकला स्तर का स्नेहन और अत्यधिक सांद्रित हाइड्रोक्लोरिक अम्ल से उसका बचाव करते हैं। हाइड्रोक्लोरिक अम्ल पेप्सिनों के लिए उचित अम्लीय माध्यम (pH 1-8) तैयार करता है। नवजातों के जठर रस में रेनिन नामक प्रोटीन अपघटनीय एंजाइम होता है जो दूध के प्रोटीन को पचाने में सहायक होता है। जठर ग्रंथियाँ थोड़ी मात्रा में लाइपेज भी स्रावित करती हैं।
छोटी आंत का पेशीय स्तर कई तरह की गतियां उत्पन करता है। इन गतियों से भोजन विभिन्न स्रावों से अच्छी तरह मिल जाता है और पाचन की क्रिया सरल हो जाती है। यकॄत अग्नाशयी नलिका द्वारा पित्त, अग्नाशयी रस और आंत्र-रस छोटी आंत में छोड़े जाते हैं। अग्नाशयी रस में टि्रप्सिनोजन, काइमोटि्रप्सिनोजन, प्रोकार्बोक्सीपेप्टिडेस, एमाइलेज और न्युक्लिएज एंजाइम निष्क्रिय रूप में होते हैं। आंत्र म्यूकोसा द्वारा स्रावित ऐंटेरोकाइनेज द्वारा टि्रप्सिनोजन सक्रिय टि्रप्सिन में बदला जाता है जो अग्नाशयी रस के अन्य एंजाइमों को
सक्रिय करता है।
ग्रहणी में प्रवेश करने वाले पित्त में पित्त वर्णक ;विलिरूबिन एवं विलिवख्रडनद्ध, पित्त लवण, कोलेस्टेरॉल और पफास्पफोलिपिड होते हैं, लेकिन कोई एंजाइम नहीं होता। पित्त वसा के इमल्सीकरण में मदद करता है और उसे बहुत छोटे मिसेल कणों में तोड़ता है। पित्त लाइपेज एंजाइम को भी सक्रिय करता है। आंत्र श्लेषमा उपकला में गोब्लेट कोशिकाएं होती हैं जो श्लेषमा का स्राव करती है। म्यूकोसा के ब्रस बॉर्डर कोशिकाओं और गोब्लेट कोशिकाओं के स्राव आपस में मिलकर आंत्र स्राव अथवा सक्कस एंटेरिकस बनाते हैं। इस रस में कई तरह के एंजाइम होते हैं, जैसे-ग्लाइकोसिडेज डायपेप्टिडेज, एस्टरेज, न्यूक्लियोसिडेज आदि।
म्यूकस अग्नाशय के बाइकार्बोनेट के साथ मिलकर आंत्र म्यूकोसा की अम्ल के दुष्प्रभाव से रक्षा करता है तथा एंजाइमों की सक्रियता के लिए आवश्यक क्षारीय माध्यम (pH 7-8) तैयार करता है। इस प्रक्रिया में सब-म्यूकोसल ब्रूनर ग्रंथि भी मदद करती है। आंत में पहुँचने वाले काइम में उपस्थित प्रोटीन, प्रोटियोज और पेप्टोन ;आंशिक अपघटित प्रोटीन अग्नाशय रस के प्रोटीन अपघटनीय एंजाइम निम्न रूप से क्रिया करते हैं:
प्रोटीन । ट्रिप्सिन/काइमोट्रिप्सिन
प्रोटियोज । ——————————-> डाईपेप्टाइड
पेप्टोन । कार्बोक्सीपेप्डेज
काइम के कार्बोहाइड्रेट अग्नाशयी एमाइलेज द्वारा डायसैकेराइड में जलापघटित होते हैं।
एमाइलेज
पालीसेकेराइड(स्टार्च)——————> डाईसेकेराइड
वसा पित्त की मदद से लाइपेजेज द्वारा क्रमश: डाई और मोनोग्लिसेराइड में टूटते हैं।
वसा——-> डाइग्लिसेराइड ——-> मोनोग्लिसेराइड
अग्नाशयी रस के न्यूक्लिएस न्यूक्लिक अम्लों को न्यूक्लियोटाइड और न्यूक्लियोसाइड में पाचित करते हैं।
न्यूक्लिक अम्ल——–> न्यूक्लियोटाइड———> न्यूक्लियोसाइड
आंत्र रस के एंजाइम उपर्युक्त अभिक्रियाओं के अंतिम उत्पादों को पाचित कर अवशोषण योग्य सरल रूप में बदल देते हैं। पाचन के ये अंतिम चरण आंत के म्यूकोसल उपकला कोशिकाओं के बहुत समीप संपन्न होते हैं।
paacankriya
ऊपर वर्णित जैव वृहत् अणुओं के पाचन की क्रिया आंत्र के ग्रहणी भाग में संपन्न होती हैं। इस तरह निर्मित सरल पदार्थ छोटी आंत के अग्रक्षुद्रांत्र और क्षुद्रांत्र भागों में अवशोषित होते हैं। अपचित तथा अनावशोषित पदार्थ बड़ी आंत में चले जाते हैं। बड़ी आंत में कोई महत्वपूर्ण पाचन क्रिया नहीं होती है। बड़ी आंत का कार्य है-1 कुछ जल, खनिज एवं औषधका अवशोषण ;
2 श्लेष्म का स्राव जो अपचित उत्सर्जी पदार्थ कणों को चिपकाने और स्नेहन होने के कारण उनका बाईँ निकास आसान बनाता है। अपचित और अवशोषित पदार्थों को मल कहते हैं, जो अस्थायी रूप से मल त्यागने से पहले तक मलाशय में रहता है।
जठरांत्रिक पथ की क्रियाएं विभिन्न अंगों के उचित समन्वय के लिए तंत्रिका और हॉर्मोन के नियंत्रण से होती है। भोजन के भोज्य पदार्थों को देखने, उनकी गंध और/अथवा मुखगुहा नली में उपस्थिति लार ग्रंथियों को स्राव के लिए उद्दीपित कर सकती हैं। इसी प्रकार जठर और आंत्रिक स्राव भी तंत्रिका संकेतों से उद्दीप्त होते हैं। आहार नाल के विभिन्न भागों की पेशियों की सक्रियता भी स्थानीय एवं केंद्रीय तंत्रिकीय क्रियाओं द्वारा नियमित होती हैं। हार्मोनल नियंत्रण के अंतर्गत, जठर और याँत्रिक म्यूकोसा से निकलने वाले हार्मोन पाचक रसों के स्राव को नियंत्रित करते हैं।
3 पाचित उत्पादों का अवशोषण-
अवशोषण वह प्रक्रिया है, जिसमें पाचन से प्राप्त उत्पाद यांत्रिक म्यूकोसा से निकलकर रक्त या लसीका में प्रवेश करते हैं। यह निष्क्रिय, सक्रिय अथवा सुसाध्य परिवहन क्रियाविधियों द्वारा संपादित होता है। ग्लुकोज, ऐमीनो अम्ल, क्लोराइड आयन आदि की थोड़ी मात्रा सरल विसरण प्रक्रिया द्वारा रक्त में पहुंच जाती हैं। इन पदार्थों का रक्त में पहुंचना सांद्रण-प्रवणता (concentration gradient) पर निर्भर है। जबकि लैक्टोज और कुछ अन्य ऐमीना अम्लों का परिवहन वाहक अणुओं जैसे सोडियम आयन की मदद से पूरा होता है। इस क्रियाविधिको सुसाध्य परिवहन कहते हैं।
जल का परिवहन परासरणी प्रवणता पर निर्भर करता है। सक्रिय परिवहन सांद्रण-प्रवणता के विरु होता है जिसके लिए ऊ र्जा की आवश्यकता होती है। विभिन्न पोषक तत्वों जैसे ऐमीनो अम्ल, ग्लुकोस ;मोनोसैकेराइड और सोडियम आयन ;विद्युत-अपघट्य का रक्त में अवशोषण इसी क्रियाविधि द्वारा होता है। वसाम्ल और ग्लिसेरॉल अविलेय होने के कारण रक्त में अवशोषित नहीं हो पाते। सर्वप्रथम वे विलेय सूक्ष्म बूंदों में समाविष्ट होकर आंत्रिक म्यूकोसा में चले जाते हैं जिन्हें मिसेल (micelles) कहते हैं। ये यहाँ प्रोटीन आस्तरित सूक्ष्म वसा गोलिका में पुन: संरचित होकर अंकुरों की लसीका वाहिनियों ;लेक्टियल में चले जाते हैं। ये लसीका वाहिकाएं अंतत: अवशोषित पदार्थों को रक्त प्रवाह में छोड़ देती हैं।
पदार्थों का अवशोषण आहारनाल के विभिन्न भागों जैसे-मुख, आमाशय, छोटी आंत और बड़ी आंत में होता है। परंतु सबसे अधिक अवशोषण छोटी आंत में होता है। अवशोषण सारांश ;अवशोषण- स्थल और पदार्थ तालिका 1 में दिया गया है। अवशोषित पदार्थ अंत में ई तकों में पहुंचते हैं जहाँ वे विभिन्न क्रियाओं के उपयोग में लाए जाते हैं। इस प्रक्रिया को स्वांगीकरण (assimilation) कहते हैं।
पाचक अवशिष्ट मलाशय में कठोर होकर संब मल वन जाता है जो तांत्रिक प्रतिवर्ती (neural reflex) क्रिया को शुरू करता है जिससे मलत्याग की इच्छा पैदा होती है। मलद्वार से मल का बहिक्षेपण एक ऐच्छिक क्रिया है जो एक बृहत् क्रमाकुंचन गति से पूरी होती है।
4 पाचन तंत्र के विकार (Disorder) और अनियमितताएं
आंत्र नलिका का शोथ जीवाणुओं और विषाणुओं के संक्रमण से होने वाला एक सामान्य विकार है। आंत्र का संक्रमण परजीवियों, जैसे- फीता कॄमि, गोलकॄमि, सूत्रकॄमि, हुकवर्म, पिनवर्म, आदि से भी होता है।
पीलिया (Jaundice) : इसमें यकॄत प्रभावित होता है। पीलिया में त्वचा और आंख पित्त वर्णकों के जमा होने से पीले रंग के दिखाई देते हैं।
वमन (Vomiting) : यह आमाशय में संगृहीत पदार्थों की मुख से बाहर निकलने की क्रिया है। यह प्रतिवर्ती क्रिया मेडुला में स्थित वमन केंद्र से नियंत्रित होती है। उल्टी से पहले बेचैनी की अनुभूति होती है।
प्रवाहिका (Diarrhoea) : आंत्र ;इवूमस की अपसामान्य गति की बारंबारता और मल का अत्यधिक पतला हो जाना प्रवाहिका (Diarrhoea) कहलाता है। इसमें भोजन अवशोषण की क्रिया घट जाती है।
कोष्ठबद्धता या कब्ज (Constipation) : कब्ज में, मलाशय में मल रुक जाता है और आंत्र की गतिशीलता अनियमित हो जाती है।
अपच (Indigestion) : इस स्थिति में, भोजन पूरी तरह नहीं पचता है और पेट भरा-भरा महसूस होता है। अपच एंजाइमों के स्राव में कमी, व्यग्रता, खाद्य विषाक्तता, अधिक भोजन करने, एवं मसालेदार भोजन करने के कारण होती है।
सारांश
मानव के पाचन तंत्र में एक आहार नाल और सहयोगी ग्रंथियाँ होती हैं। आहर नाल मुख, मुखगुहा, ग्रसनी, ग्रसिका, आमाशय, क्षुद्रांत्र, वृहदांत्र, मलाशय और मलद्वार से बनी होती है। सहायक पाचन ग्रंथियों में लार ग्रंथि, यकॄत ;पित्ताशय सहित और अग्नाशय हैं। मुख के अंदर दाँत भोजन को चबाते हैं, जीभ स्वाद को पहचानती है और भोजन को लार के साथ मिलाकर इसे अच्छी तरह से चबाने के लिए सुगम बनाती है। लार में मंड या मांड ;स्टार्च पचाने वाली पाचक एंजाइम, लार एमिलेज होती है जो मांड को पचाकर माल्टोस ;डाइसैकेराइड में बदल देती हैं। इसके बाद भोजन ग्रसनी से होकर बोलस के रूप में ग्रसिका में प्रवेश करता है, जो आगे क्रमाकुंचन द्वारा आमाशय तक ले जाया जाता है। आमाशय में मुख्यत: प्रोटीन का पाचन होता है। सरल शर्कराओं, अल्कोहल और दवाओं का भी आमाशय में अवशोषण होता है।
काइम क्षुद्रांत्र के ग्रहणी भाग में प्रवेश करता है जहाँ अग्नाशयी रस, पित्त और अंत में आंत्र रस के एंजाइमों द्वारा कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा का पाचन पूरा होता है। इसके बाद भोजन छोटी आँत के अग्र क्षुद्रांत्र ;जेजुनम और क्षुद्रांत्र ;इलियम भाग में जाता है। पाचन के पश्चात कार्बोहाइड्रट, ग्लुकोस जैसे- मोनोसैकेराइड में परिवर्तित हो जाते हैं। अंतत: प्रोटीन टूटकर ऐमीनो अम्लों में तथा वसा, वसीय अम्लों और ग्लिसेराल में परिवर्तित हो जाते हैं।
श्वसन ( Respiration)
प्रत्येक जीव को जीवित रहने हेतु ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है क्योंकि ऑक्सीजन ही कार्बनिक भोज्य पदार्थों का ऑक्सीकरण या विघटन करके ऊर्जा प्रदान करते हैं। भोज्य पदार्थों के ऑक्सीकरण की यही प्रक्रिया श्वसन (Respiration) कहलाती है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जीवों में सम्पन्न होनेवाली वह ऑक्सीकरण क्रिया जिसमें ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में जटिल भोज्य पदार्थों का सामान्य शरीर तापमान पर विभिन्न एन्जाइमों के नियंत्रण में क्रमिक अपघटन होता है, जिसके फलस्वरूप सरल भोज्य पदार्थ CO2 अथवा जल एवं CO2 का निर्माण होता है तथा ऊर्जा मुक्त होती है, श्वसन कहलाती है।
ऑक्सीजन के अंतर्ग्रहण (Ingestion) करने का कार्य श्वसन तंत्र (Respiratory system) करता है। श्वसन तंत्र के द्वारा शरीर की प्रत्येक कोशिका ऑक्सीजन की सम्पूर्ति प्राप्त करती है, साथ-ही-साथ ऑक्सीकरण उत्पादनों से मुक्त हो जाती है। श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है-
बाह्य श्वसन (External respiration), 2. गैसों का परिवहन (Transportation of gases), 3. आन्तरिक श्वसन (Internal respiration)।
बाह्य श्वसन (External respiration): प्राणी और वातावरण के बीच श्वसन गैसों (O2 एवं CO2) के आदान-प्रदान अर्थात् ऑक्सीजन का शरीर में आना और कार्बन डाइऑक्साइड का शरीर से बाहर जाना बाह्य श्वसन कहलाता है चूंकि इस प्रकार की श्वसन क्रिया फुफ्फुसों (Lungs) में ही सम्पन्न होती है। इसलिए इसे फुफ्फुस श्वसन (Pulmonary respiration) भी कहते हैं। चूंकि इसमें ऑक्सीजन का रुधिर में मिलना तथा CO2 का शरीर से बाहर निकलना सम्मिलित होता है, अतः इसे गैसीय विनिमय (Gaseous exchange) भी कहते हैं।
गैसों का परिवहन (Transportation of gases): गैसों अर्थात् ऑक्सीजन एवं कार्बन डाइऑक्साइड का फेफड़े से शरीर की कोशिकाओं तक पहुँचना तथा पुनः फेफड़े तक वापस आने की क्रिया को गैसों का परिवहन कहते हैं। श्वसन गैसों का परिवहन रुधिर परिसंचरण तंत्र की सहायता से होता है।
(a) ऑक्सीजन का परिवहन (Transportation of oxygen): ऑक्सीजन का परिवहन मुख्यतः रुधिर में पाये जाने वाले लाल वर्णक हीमोग्लोबिन (Haemoglobin) के द्वारा होता है। हीमोग्लोबिन ऑक्सीजन से संयुक्त होकर एक अस्थायी यौगिक ऑक्सीहीमोग्लोबिन (Oxyhaemoglobin) बनाता है जो एक भौतिक परिवर्तन (Physical change) है।
Hb (हीमोग्लोबिन) + O2 (ऑक्सीजन) → HbO2 (ऑक्सीहीमोग्लोबिन)
यह ऑक्सीहीमोग्लोबिन रुधिर परिसंचरण के द्वारा शरीर की विभिन्न कोशिकाओं में पहुँचता है। कोशिकाओं में ऑक्सीजन का आंशिक दाब कम रहता है जिसके कारण ऑक्सीहीमोग्लोबिन का विखण्डन ऑक्सीजन एवं हीमोग्लोबिन में हो जाता है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन मुक्त होकर ऊतकों में प्रवेश कर जाता है।
हीमोग्लोबिन बैंगनी रंग (violet) का होता है जबकि ऑक्सी हीमोग्लोबिन चमकदार लाल रंग का होता है। ऑक्सीजन की कितनी मात्रा का संयोजन हीमोग्लोबिन से होगा, यह ऑक्सीजन के आंशिक दाब एवं रक्त के pH पर आधारित होता है।
हीमोग्लोबिन को श्वसन वर्णक (Respiratory pigment) कहा जाता है। यह दो भागों से मिलकर बना होता है। प्रथम भाग हीमेटीन या होम (Haernatin or Heme) कहलाता है। हीम एक आयरन पारफाइरिन (Iron Porfirin) होता है। इसके केन्द्रक में एक लौह परमाणु (Fe) रहता है। हीमोग्लोबिन का दूसरा भाग ग्लोबिन (Globin) कहलाता है जो कि एक रंगहीन प्रोटीन है। यह हीमोग्लोबिन का 95% होता है।
(b) कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन (Transportation of Carbondioxide): कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन कोशिकाओं से फेफड़े तक हीमोग्लोबिन के द्वारा केवल 10 से 20 प्रतिशत तक ही हो पाता है। अतः CO2 का परिवहन रुधिर परिसंचरण द्वारा अन्य प्रकार से भी होता है जो निम्नलिखित हैं-
(i) प्लाज्मा में घुलकर (Dissolved in plasma): कार्बन डाइऑक्साइड रुधिर प्लाज्मा में घुलकर कार्बोनिक अम्ल (Carbonic acid) बनाती है। कार्बोनिक अम्ल के रूप में CO2 का लगभग 7% परिवहन होता है।
CO2 + H2O ⇌ H2CO3 (कार्बोनिक अम्ल)
(ii) बाइकार्बोनेट्स के रूप में (As bicarbonates): बाइकार्बोनेट्स के रूप में कार्बन डाइऑक्साइड के अधिकांश भाग (लगभग 70%) का परिवहन होता है। यह रुधिर के पोटैशियम तथा प्लाज्मा के सोडियम से मिलकर क्रमशः पोटैशियम बाइकार्बोनेट एवं सोडियम बाइकार्बोनेट बनाता है।
RBC में बाइकार्बोनेट का निर्माण:
CO2 + H2O —कार्बोनिक एनहाइड्रेज→ H2CO3 (कार्बोनिक अम्ल) H2CO3 → H+ + HCO3– (बाइकार्बोनेट)
CO2 + H2O + Na2CO3 → 2NaHCO3 (सोडियम बाइकार्बोनेट)
(iii) कर्बोमिनो यौगिकों के रूप में (As carbomino compounds): कार्बन डाइऑक्साइड हीमोग्लोबिन के अमीनो (-NH2) समूह से संयोग कर कार्बोक्सी हीमोग्लोबिन (Carboxy haemoglobin) तथा प्लाज्मा प्रोटीन से संयोग कर कार्बोमिनो-हीमोग्लोबिन बनाता है। इस प्रकार यह लगभग 23% CO2 का परिवहन करता है।
CO2 + H2O → NHCOOH कार्बोमिनो यौगिक
HbNH2 + CO2 → Hb NHCOOH कार्बोक्सिल हीमोग्लोबिन
मनुष्य में साँस लेने की दर 12-15 बार प्रति मिनट होती है। सामान्य श्वसन के दौरान लगभग 1500 ml वायु फेफड़े में हर समय भरी रहती है। इसे फेफड़े की कायत्मिक अवशेष सामर्थ्य (Functional residual capacity) कहते हैं।
आन्तरिक श्वसन (Internal respiration): शरीर के अन्दर रुधिर एवं ऊतक द्रव्य के बीच होने वाले गैसीय विनिमय को आन्तरिक श्वसन कहते हैं। फेफड़े में होनेवाले गैसीय विनिमय को बाह्य श्वसन कहते हैं। चूंकि आन्तरिक श्वसन कोशिका के अन्दर होता है। अतः इसे कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) भी कहते हैं। आन्तरिक श्वसन या कोशिकीय श्वसन में निम्नलिखित प्रक्रियाएँ सम्मिलित होती हैं।
(i) ऑक्सीहीमोग्लोबिन का विघटन (Dissociation of oxyhaemoglobin): रक्त परिसंचरण के परिणामस्वरूप ऑक्सीहीमोग्लोबिन कोशिकाओं में पहुँचता है जहाँ पर ऑक्सीजन का दाब कम होता है। अत: ऑक्सीहीमोग्लोबिन का ऑक्सीजन में विघटन हो जाता है। इस प्रकार से लगभग 25% ऑक्सीजन ऊतकों में पहुँच जाते हैं।
HbO2 (ऑक्सीहीमोग्लोबिन) → Hb (हीमोग्लोबिन) + O2 (ऑक्सीजन)
(ii) खाद्य पदार्थों का ऑक्सीकरण (Oxidation of food stuffs): कोशिकाद्रव्य में ऑक्सीजन की उपस्थिति में विभिन्न खाद्य पदार्थों का विभिन्न एन्जाइमों की उपस्थिति में ऑक्सीकरण होता है जिसके परिणामस्वरूप ऊर्जा मुक्त होती है।
आन्तरिक श्वसन दो प्रकार के होते हैं- A. अनॉक्सीश्वसन (Anaerobic respiration) B. ऑक्सी श्वसन (Aerobic respiration)
अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic respiration): वह श्वसन जो ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है, अनॉक्सी श्वसन कहलाता है। इसमें जटिल रासायनिक प्रतिक्रियाओं की श्रृंखला द्वारा ग्लूकोज (कोशिकीय ईंधन) का आंशिक विखंडन होता है। ग्लूकोज का यह आंशिक विखंडन 12 एन्जाइमों की सहायता से कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। इसके अन्तर्गत होनेवाले सम्पूर्ण प्रक्रम को ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis) कहते हैं। अनॉक्सी श्वसन का अन्तिम उत्पाद पाइरुविक अम्ल (Pyruvic acid) होता है। सम्पूर्ण प्रक्रम में 4 अणु ATP ऊर्जा का निर्माण होता है, जिसमें से 2 अणु ATP ऊर्जा इस प्रक्रम के सम्पन्न होने में खर्च हो जाती है। इस प्रकार 2 अणु ATP का शुद्ध लाभ होता है। इसमें ग्लूकोज अणु के आंशिक विखण्डन के कारण उनसे लगभग 7% ऊर्जा मुक्त हो पाती है, शेष ऊर्जा पाइरुविक अम्ल के बन्धनों में ही संचित रह जाती है। यह बची हुई ऊर्जा आण्विकु ऑक्सीजन की उपस्थिति में पाइरुविक अम्ल के पूर्ण विखण्डन के फलस्वरूप मुक्त होती है।
यदि पाइरुविक अम्ल को स्थायी रूप से आण्विक ऑक्सीजन बिल्कुल उपलब्ध नहीं हो पाती तब यह चरण स्थायी हो जाता है और पाइरुविक अम्ल लैक्टिक अम्ल या एथिल ऐल्कोहॉल में परिवर्तित हो जाता है। उदाहरणस्वरूप- पौधों, मांसल फलों, जीवाणुओं एवं फफूंदों में पाइरुविक अम्ल का परिवर्तन एथिल ऐल्कोहॉल में हो जाता है और CO2 मुक्त होती है।
C6H12O6 (ग्लूकोज) → 2C2H5OH (एथिल ऐल्कोहॉल) + 2CO2 + 210 kJ
जन्तुओं में पेशियों में आण्विक ऑक्सीजन की स्थिति में पाइरुविक अम्ल का परिवर्तन लैक्टिक अम्ल में हो जाता है ।
C6H12O6 (ग्लूकोज) → 2C3H6O3 (लैक्टिक अम्ल) + 150 kJ
अनॉक्सी श्वसन प्रायः जीवों में गहराई पर स्थित ऊतकों में, अंकुरित होते बीजों में व फलों में अल्प समय के लिए होता है। अनॉक्सी श्वसन (Anaerobic respiration) को शर्करा किण्वन भी कहा जाता है।
ऑक्सीश्वसन (Aerobic Respiration): कोशिकीय श्वसन का यह चरण कोशिका के अंदर माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) में सम्पन्न होता है। इस चरण में विभिन्न रासायनिक प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला और अनेक एन्जाइमों की सहायता से पाइरुविक अम्ल का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है तथा अन्त में CO2 एवं जल उपोत्पाद के रूप में बनते हैं और ढेर सारी रासायनिक ऊर्जा मुक्त होती है जो ATP अणुओं में संचित हो जाती है। इस चरण के अन्त में 36ATP के अणु प्राप्त होते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण कोशिकीय श्वसन में एक अणु ग्लूकोज से 38ATP ऊर्जा प्राप्त होती है। एक अणु ग्लूकोज के पूर्ण विखण्डन या पूर्ण ऑक्सीकरण के फलस्वरूप कुल ऊर्जा का लगभग 55 से 60 प्रतिशत तक ही जीवों को उपलब्ध होता है, शेष ऊर्जा ऊष्मा ऊर्जा के रूप में ह्रासित हो जाती है।
C6H12O6 + 6O2 → 6CO2 + 6H2O + 2830 kJ
अनॉक्सी श्वसन एवं ऑक्सी श्वसन में अंतर
अनॉक्सी श्वसन ऑक्सी श्वसन
1. यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। 1. यह ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।
2. अनॉक्सी श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। 2. ऑक्सीश्वसन का प्रथम चरण कोशिकाद्रव्य में तथा द्वितीय चरण माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होती है।
3. अनॉक्सी श्वसन में ग्लूकोज का आंशिक ऑक्सीकरण होता है एवं पायरुवेट इथेनॉल या लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है । 3. ऑक्सी श्वसनमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) एवं जल (H2O) का निर्माण होता है।
4. इसमें ग्लूकोज के 1 ग्राम अणु से ATP के 2 अणु बनते हैं। 4. इसमें ग्लूकोज के एक ग्राम अणु से ATP के 38 अणु बनते हैं।
5. एक ग्लूकोज अणु से केवल 54 k cal ऊर्जा मुक्त होती है। 5. एक ग्लूकोज अणु से 686 kcal ऊर्जा मुक्त होती है।
6. यह अवायवीय जीवाणुओं यीस्ट तथा आंत्रीय परजीवियों में होता है। 6. यह अधिकांश जन्तुओं एवं पेड़-पौधों में होता है।
श्वसन की क्रियाविधि (Mechanism of respiration): श्वसन की प्रक्रिया सामान्यतया दो पदों में सम्पन्न होती है। ये हैं- 1. ग्लाइकोलाइसिस तथा 2. क्रेब्स चक्र।
ग्लाइकोलिसिस (Glycolysis): इस प्रक्रिया में ग्लूकोज के एक अणु से पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं का निर्माण होता है। इस प्रक्रिया में ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती है। अतः यह प्रक्रिया अनॉक्सीश्वसन तथा ऑक्सीश्वसन में एक जैसी ही होती है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में पूर्ण होती है। ग्लाइकोलिसिस के पूरे चरण में ATP के 4 अणु बनते हैं जबकि ATP के 2 अणु खर्च हो जाते हैं। इस प्रकार इस प्रक्रिया में ATP के दो अणुओं का शुद्ध लाभ होता है। इस प्रक्रिया में हाइड्रोजन के चार परमाणु बनते हैं जो NAD को 2NADH2 में बदलने में काम आते हैं।
ग्लाइकोलिसिस की खोज जर्मनी के तीन जीव वैज्ञानिकों एम्बडेन-मेयरहॉफ एव पारसन ने की थी, इस कारण इसे EMP पाथवे भी कहते हैं।
क्रेब्स चक्र (Kreb’s cycle): इस प्रक्रिया की खोज 1937 ई. में ब्रिटिश वैज्ञानिक हैन्स क्रेब्स (Hens Krebs) ने की थी। क्रेब्स चक्र की सम्पूर्ण अभिक्रियाएँ यूकैरियोटिक जीवों में माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) में तथा प्रोकैरियोटिक जीवों में कोशिका कला (Cell membrane) पर होती है। इसमें ग्लाइकोलिसिस से प्राप्त पाइरुविक अम्ल के दोनों अणुओं का ऑक्सीजन की उपस्थिति में पूर्ण ऑक्सीकरण (Oxidation) होता है। इस चरण में होने वाले प्रमुख परिवर्तन इस प्रकार हैं-
(i) क्रेब्स चक्र में प्रवेश करने से पूर्व पाइरुविक अम्ल से CO2 के एक अणु तथा दो हाइड्रोजन परमाणुओं का विमोचन होता है। बचा हुआ अणु कोएन्जाइम-A से संयुक्त होकर ऐसीटल कोएन्जाइम-A बनाता है।
(ii) ऐसीटल कोएन्जाइम-A अब कोशिका में उपस्थित ऑक्जैलो एसीटिक अम्ल तथा जल से क्रिया कर साइट्रिक अम्ल बनाता है।
(iii) साइट्रिक अम्ल का क्रेब्स चक्र में धीरे-धीरे कई अभिक्रियाओं के माध्यम से क्रमबद्ध विघटन होता है। इन अभिक्रियाओं के परिणामस्वरूप कई मध्यवर्ती अम्ल बनते हैं, जैसे- ऑक्जैलोसक्सिनिक अम्ल, अल्फा कीटोग्लूटेरिक अम्ल, सक्सिनिक अम्ल, फ्यूमेरिक अम्ल मैलिक अम्ल आदि। इन परिवर्तनों के दौरान CO2 के 2 अणु तथा हाइड्रोजन के 8 परमाणु मुक्त होते हैं।
(iv) अन्त में मैलिक अम्ल का परिवर्तन ऑक्जैलोग्लिसरिक अम्ल में होता है। यह पुनः दूसरे पाइरुविक अम्ल के साथ संयुक्त होकर क्रेब्स चक्र में पुनः प्रवेश करता है।
ऊर्जा का उत्पादन (Production of energy): पाइरुविक अम्ल के अणु के ऑक्सीकरण से ATP का एक अणु 5 अणु NADH के और 1 अणु FADH2 का बनता है। NADH के एक अणु से 3 अणु ATP के और FADH2 के एक अणु से ATP के दो अणु प्राप्त होते हैं। इस प्रकार पाइरुविक अम्ल के एक अणु से 1 + (3 × 5) + (2 × 1) = 1 + 15 + 2 = 18 अणु ATP बनते हैं।
चूंकि ग्लूकोज के एक अणु से दो अणु पाइरुविक अम्ल के बनते हैं। इसलिए पाइरुविक अम्ल के दो अणुओं से 2 × 18 = 36 अणु ATP के प्राप्त होते हैं। ग्लाइकोलिसिस के दौरान भी 2 ATP अणुओं का लाभ होता है। अतः ग्लूकोज के 1 अणु के श्वसन से 2 + 36 = 38 अणु ATP प्राप्त होते हैं। स्पष्ट है कि हमारे तंत्र में अधिकतम ATP अणुओं का उत्पादन क्रेब्स चक्र के दौरान ही होता है।
मनुष्य का श्वसन तत्र (Respiratory system in human): मनुष्य का श्वसन तंत्र कई अंगों से मिलकर बना होता है। इन अंगों में सबसे महत्वपूर्ण अंग फेफड़ा (Lungs) या फुफ्फुस होता है, जहाँ पर गैसों का विनिमय (Exchange of gases) होता है। इस कारण इसे फुफ्फुसीय श्वसन (Pulmonary respiration) भी कहा जाता है। मनुष्य के श्वसन तंत्र के अन्तर्गत वे सभी अंग आते हैं जिनसे होकर वायु का आदान-प्रदान होता है। मनुष्य में नासिका छिद्र (Nostrils), स्वरयंत्र (Larynx), श्वासनली (Trachea) तथा फेफड़ा एक (Lungs) मिलकर श्वसन अंग कहलाते हैं।
निश्वसन तथा उच्छश्वास में अन्तर
निश्वसन (Inspiration) उच्छश्वास (Expiration)
1. यह वायुमण्डल की वायु का फेफड़ों में प्रवेश की क्रिया है। 1. यह फेफड़ों में भरी वायु का फेफड़ों से बाहर निकलने की क्रिया है।
2. इससे फेफड़ों में वायुदाब कम होता है। 2. इससे फेफड़ों में वायुदाब अधिक होता है।
3. इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ सिकुड़ती हैं, जिससे डायफ्राम चपटा हो जाता है। 3. इसमें डायफ्राम की अरीय पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं जिससे डायफ्राम गुम्बद के समान होता है।
4. बाह्य अन्तरापर्शुक पेशियाँ तथा अन्तः अन्तरापर्शुक पेशियाँ के इन्टरकार्टिलेजिनस भाग सिकुड़ते हैं जिनसे वक्षकण्डी बाहर की ओर खीच जाती हैं। 4. अन्तः अन्तरापशुक पेशियों के सिकुड़ने तथा बाह्य अन्तरापशुक पेशियों के शिथिलन से वक्षकण्डी अंदर की ओर खींच आती हैं।
5. इसमें प्लूरल गुहाओं का आयतन अधिक होता है। 5. इसमें प्लूरल गुहाओं का आयतन कम होता है।
अनॉक्सी श्वसन एवं ऑक्सी श्वसन में अंतर
अनॉक्सी श्वसन ऑक्सी श्वसन
1. यह ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। 1. यह ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है।
2. अनॉक्सी श्वसन की सम्पूर्ण प्रक्रिया कोशिकाद्रव्य में सम्पन्न होती है। 2. ऑक्सीश्वसन का प्रथम चरण कोशिकाद्रव्य में तथा द्वितीय चरण माइटोकॉण्ड्रिया में सम्पन्न होती है।
3. अनॉक्सी श्वसन में ग्लूकोज का आंशिक ऑक्सीकरण होता है एवं पायरुवेट इथेनॉल या लैक्टिक अम्ल का निर्माण होता है । 3. ऑक्सी श्वसनमें ग्लूकोज का पूर्ण ऑक्सीकरण होता है तथा कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) एवं जल (H2O) का निर्माण होता है।
4. इसमें ग्लूकोज के 1 ग्राम अणु से ATP के 2 अणु बनते हैं। 4. इसमें ग्लूकोज के एक ग्राम अणु से ATP के 38 अणु बनते हैं।
5. एक ग्लूकोज अणु से केवल 54 k cal ऊर्जा मुक्त होती है। 5. एक ग्लूकोज अणु से 686 kcal ऊर्जा मुक्त होती है।
6. यह अवायवीय जीवाणुओं यीस्ट तथा आंत्रीय परजीवियों में होता है। 6. यह अधिकांश जन्तुओं एवं पेड़-पौधों में होता है।
जनन( Reproduction)
पौधों में अलैंगिक प्रजनन क्या है और यह किन विधियों से होता है?
अलैंगिक प्रजनन निम्नलिखित छह प्रकार का होता है –
विखंडन
• द्विखंडन (Binary Fission)
• बहुविखंडन (Multiple Fission) ...
मुकुलन
बीजाणु निर्माण ...
पुनर्जनन
खंडन
जनन की विधियां----
विखंडन-
एककोशिक जीवों जैसे जीवाणु तथा प्रोटोजोआ की कोशिका , कोशिका विभाजन द्वारा सामान्यतः दो बराबर भागों में विभक्त हो जाती हैं ।अमीबा जैसे जीवो में कोशिका विभाजन किसी भी तल से हो सकता है ,परंतु कुछ एक कोशिक जीवो में शारीरिक संरचना अधिक संगठित होती है उदाहरणतः कालाजार के रोगाणु, लेस्मनिया मैं कोशिका के एक सिरे पर कोड़े के समान सूक्ष्म सरचना होते हैं ऐसे में विखंडन एक निर्धारित तल से होता है ।मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम जैसे अन्य एककोशिक एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाते हैं , जिसे बहुखंडन कहते हैं|
खंडन--
सरल सरचना वाले बहुकोशिक जीवो में जनन की सरल विधि कार्य करती हैं ।उदाहरणतः स्पाइरोगाइरा सामान्यतः विकसित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है ,यह टुकड़े अथवा खंड वृद्धि करने जीव में विकसित हो जाते हैं।
पुनरुदभवन---
पूर्णरूपेण विभेदित जीवो में अपने कायिक भाग से नए जीव के निर्माण की क्षमता होती है, अर्थात यदि किसी कारणवश जीव क्षत विक्षत हो जाता है अथवा कुछ टुकड़ों में टूट जाता है तो इसके अनेक टुकड़े वृद्धि कर ने जीव में विकसित हो जाते हैं ।उदाहरणतः हाइड्रा तथा प्लेनेरिया जैसे सरल प्राणियों को यदि कई टुकड़ों में काट दिया जाए तो प्रत्येक टुकड़ा विकसित होकर पूर्ण जीव का निर्माण कर देता है यह पुनरुदभवन कहलाता है।
मुकुलन----
हाइड्रा जैसे कुछ प्राणी पुनर्जनन की क्षमता वाली कोशिकाओं का उपयोग मुकुलन के लिए करते हैं, हाइड्रा में कोशिकाओं के नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है यह उभार वृद्धि करता हुआ नन्हे जीव में बदल जाता है तथा पूर्ण विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतंत्र जीव बन जाता है।
कायिक प्रवर्धन---
ऐसे बहुत से पौधे हैं जिनमें कुछ भाग जैसे जड़ तना तथा पत्तियां उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होकर नया पौधा उत्पन्न करते हैं ,अधिकतर जंतुओं के विपरीत एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की विधि के रूप में करते हैं , परतन, कलम अथवा रोपण जैसी कायिक प्रवर्धन की तकनीक का उपयोग कृषि क्षेत्र में भी किया जाता है। गन्ना गुलाब अथवा अंगूर इसके कुछ उदाहरण है इसी प्रकार ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कुछ कलिका विकसित होकर मृदा में गिर जाती हैं तथा नए पौधे में विकसित हो जाती हैं।
बीजाणु (spors)--
अनेक सरल बहु कोशिक जीवो में भी विशिष्ट जनन संरचनाएं पाई जाती हैं ,जैसे राइजोपस में सूक्ष्म गुच्छ संरचनाएं जनन में भाग लेती हैं ये गुच्छ बीजाणु धानी है जिनमें विशेष कोशिकाएं अथवा बीजाणु पाए जाते हैं यह बीजाणु वृद्धि करके राइजोपस के नए जीव उत्पन्न करते हैं
कुछ पौधों का जनन कृत्रिम रीति से भी होता है। कुछ पौधे तनों की कतरन (cutting) से (इसके उदाहरण डूरैंडा, गुलाब, मेंहदी इत्यादि हैं), कुछ पौधे कलम बाँधने (Grafting) से (इसके उदाहरण आम, नीबू, कटहल आदि हैं) और कुछ दाब कलम (Layering) से (इसका उदाहरण अंगूर की लता है) नए पौधों को उत्पन्न करते हैं।
पोधो में लैंगिक जनन
अधिक विकसित पौधों में फल और बीज द्वारा लैंगिक जनन होता है
पौधों में अलैंगिक प्रजनन क्या है और यह किन विधियों से होता है?
अलैंगिक प्रजनन निम्नलिखित प्रकार का होता है –
विखंडन
• द्विखंडन (Binary Fission)
• बहुविखंडन (Multiple Fission) ...
मुकुलन
बीजाणु निर्माण ...
पुनर्जनन
खंडन
कायिक जनन
अलैंगिक जनन की विधियां----
बहुविखंडन-
एककोशिक जीवों जैसे जीवाणु तथा प्रोटोजोआ की कोशिका , कोशिका विभाजन द्वारा सामान्यतः दो बराबर भागों में विभक्त हो जाती हैं ।अमीबा जैसे जीवो में कोशिका विभाजन किसी भी तल से हो सकता है ,परंतु कुछ एक कोशिक जीवो में शारीरिक संरचना अधिक संगठित होती है उदाहरणतः कालाजार के रोगाणु, लेस्मनिया मैं कोशिका के एक सिरे पर कोड़े के समान सूक्ष्म सरचना होते हैं ऐसे में विखंडन एक निर्धारित तल से होता है ।मलेरिया परजीवी प्लाज्मोडियम जैसे अन्य एककोशिक एक साथ अनेक संतति कोशिकाओं में विभाजित हो जाते हैं , जिसे बहुखंडन कहते हैं|
विखंडन--
सरल सरचना वाले बहुकोशिक जीवो में जनन की सरल विधि कार्य करती हैं ।उदाहरणतः स्पाइरोगाइरा सामान्यतः विकसित होकर छोटे-छोटे टुकड़ों में खंडित हो जाता है ,यह टुकड़े अथवा खंड वृद्धि करने जीव में विकसित हो जाते हैं,
पुनरुदभवन---
पूर्णरूपेण विभेदित जीवो में अपने कायिक भाग से नए जीव के निर्माण की क्षमता होती है, अर्थात यदि किसी कारणवश जीव क्षत विक्षत हो जाता है अथवा कुछ टुकड़ों में टूट जाता है तो इसके अनेक टुकड़े वृद्धि कर ने जीव में विकसित हो जाते हैं ।उदाहरणतः हाइड्रा तथा प्लेनेरिया जैसे सरल प्राणियों को यदि कई टुकड़ों में काट दिया जाए तो प्रत्येक टुकड़ा विकसित होकर पूर्ण जीव का निर्माण कर देता है यह पुनरुदभवन कहलाता है।
मुकुलन----
हाइड्रा जैसे कुछ प्राणी पुनर्जनन की क्षमता वाली कोशिकाओं का उपयोग मुकुलन के लिए करते हैं, हाइड्रा में कोशिकाओं के नियमित विभाजन के कारण एक स्थान पर उभार विकसित हो जाता है यह उभार वृद्धि करता हुआ नन्हे जीव में बदल जाता है तथा पूर्ण विकसित होकर जनक से अलग होकर स्वतंत्र जीव बन जाता है।
कायिक प्रवर्धन---
ऐसे बहुत से पौधे हैं जिनमें कुछ भाग जैसे जड़ तना तथा पत्तियां उपयुक्त परिस्थितियों में विकसित होकर नया पौधा उत्पन्न करते हैं ,अधिकतर जंतुओं के विपरीत एकल पौधे इस क्षमता का उपयोग जनन की विधि के रूप में करते हैं , परतन, कलम अथवा रोपण जैसी कायिक प्रवर्धन की तकनीक का उपयोग कृषि क्षेत्र में भी किया जाता है। गन्ना गुलाब अथवा अंगूर इसके कुछ उदाहरण है इसी प्रकार ब्रायोफिलम की पत्तियों की कोर पर कुछ कलिका विकसित होकर मृदा में गिर जाती हैं तथा नए पौधे में विकसित हो जाती हैं।
बीजाणु द्वारा जनन
अनेक सरल बहु कोशिक जीवो में भी विशिष्ट जनन संरचनाएं पाई जाती हैं ,जैसे राइजोपस में सूक्ष्म गुच्छ संरचनाएं जनन में भाग लेती हैं ये गुच्छ बीजाणु धानी है जिनमें विशेष कोशिकाएं अथवा बीजाणु पाए जाते हैं यह बीजाणु वृद्धि करके राइजोपस के नए जीव उत्पन्न करते हैं
कायिक जनन
कुछ पौधों का जनन कृत्रिम रीति से भी होता है। कुछ पौधे तनों की कतरन (cutting) से (इसके उदाहरण डूरैंडा, गुलाब, मेंहदी इत्यादि हैं), कुछ पौधे कलम बाँधने (Grafting) से (इसके उदाहरण आम, नीबू, कटहल आदि हैं) और कुछ दाब कलम (Layering) से (इसका उदाहरण अंगूर की लता है) नए पौधों को उत्पन्न करते हैं।
लैंगिक जनन
अधिक विकसित पौधों में फल और बीज द्वारा लैंगिक जनन होता है। उनके फूलों में नर गैमीट और मादा गैमीट (Gamete) होते हैं, जिनके सायुज्य से युग्मक (Zygote) बनते हैं। ये बीज के अंदर भ्रूण में विकसित हो, अंकुर बनकर नए पौधों को जन्म देते हैं। गैमीट बहुत सूक्ष्म और एककोशिकीय होते हैं। लैंगिक जनन में दो विभिन्न जनकों की आवश्यकता होती है। कभी-कभी एक ही प्रकार के दो गैमीट मिलकर जनन करते हैं। ऐसे मिलन का समागम (Conjugation) कहते हैं। दो विभिन्न गैमीटों के मिलने को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। शैवाल और कवक सदृश निम्न श्रेणी के पौधों में समागम से जनन होता है और उच्च श्रेणी की वनस्पतियों में निषेचन से। जिन पौधों के गैमीट में नर और मादा का विभेद नहीं होता उन्हें समयुग्मक (Isogametes) कहते हैं और ऐसे पौधों को समयुग्मी (isogamous)। निषेचन में नर और मादा के मिलने से जो बनाता है उसे शुक्रितांड (Oospore), गैमीट को असम युग्मक (heterogamete) और पौधे को असमयुग्मीया या विविधपुष्पी (heterogamous) कहते हैं। जनन की उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य विधियों, जैसे अजीवाणुजनन (Apospory), अपयुग्मजनन (Apogamy) और असेचन जनन (Parthenogenesis) से भी जनन होता है। होता है। उनके फूलों में नर गैमीट और मादा गैमीट (Gamete) होते हैं, जिनके सायुज्य से युग्मक (Zygote) बनते हैं। ये बीज के अंदर भ्रूण में विकसित हो, अंकुर बनकर नए पौधों को जन्म देते हैं। गैमीट बहुत सूक्ष्म और एककोशिकीय होते हैं। लैंगिक जनन में दो विभिन्न जनकों की आवश्यकता होती है। कभी-कभी एक ही प्रकार के दो गैमीट मिलकर जनन करते हैं। ऐसे मिलन का समागम (Conjugation) कहते हैं। दो विभिन्न गैमीटों के मिलने को निषेचन (Fertilization) कहते हैं। शैवाल और कवक सदृश निम्न श्रेणी के पौधों में समागम से जनन होता है और उच्च श्रेणी की वनस्पतियों में निषेचन से। जिन पौधों के गैमीट में नर और मादा का विभेद नहीं होता उन्हें समयुग्मक (Isogametes) कहते हैं और ऐसे पौधों को समयुग्मी (isogamous)। निषेचन में नर और मादा के मिलने से जो बनाता है उसे शुक्रितांड (Oospore), गैमीट को असम युग्मक (heterogamete) और पौधे को असमयुग्मीया या विविधपुष्पी (heterogamous) कहते हैं। जनन की उपर्युक्त विधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य विधियों, जैसे अजीवाणुजनन (Apospory), अपयुग्मजनन (Apogamy) और असेचन जनन (Parthenogenesis) से भी जनन होता है।
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