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Sunday, April 26, 2020

कक्षा 9 भोतिक विज्ञान गति

विस्थापन (displacement)
किसी वस्तु द्वारा अपनी प्रारम्भिक स्थिति व अन्तिम स्थिति के मध्य की सबसे कम दूरी वाले पथ की लम्बाई को विस्थापन कहते है। ... विस्थापन का M.K.S पद्धति में मात्रक 'मीटर' होता है। यह एक सदिश राशि है। अर्थात विस्थापन में परिमाण के साथ दिशा का भी वर्णन करना आवश्यक है।

दूरी (distance) दिक् में किन्ही दो बिन्दुओं के बीच की जगह के सांख्यिक मापन को कहते हैं, अर्थात यह उन दोनों बिन्दुओं के बीच के पथ की लम्बाई का माप है। किसी गतिमान वस्तु द्वारा किसी समय में तय किए पथ की लंबाई को भी उस वस्तु द्वारा चली गई दूरी कहते हैं।

वेग (velocity ): किसी वस्तु के विस्थापन की दर को या एक निश्चित दिशा में प्रति सेकंड वस्तु द्वारा तय की दूरी को वेग कहते हैं. यह एक सदिश राशि है. ... त्वरण (acceleration): किसी वस्तु के वेग में परिवर्तन की दर को त्वरण कहते हैं

 F = ma
बल=द्रव्यमान(mass)×त्वरण(acceleration)

F=-बल (न्यूटन ×किलोग्राम) x मीटर/सेकण्ड x सेकण्ड़),

m--वजन,  a--त्वरण

तृतीय नियम: प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।

सबसे पहले न्यूटन ने इन्हे अपने ग्रन्थ फिलासफी नेचुरालिस प्रिंसिपिआ मैथेमेटिका (सन 1687) में संकलित किया था।

जड़त्व का प्रथम नियम-प्रत्येक पिण्ड तब तक अपनी विरामावस्था में अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था में रहता है  जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने के लिए विवश नहीं करता। इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है।

द्वितीय नियम: किसी भी पिंड की संवेग परिवर्तन की दर लगाये गये बल के समानुपाती होती है और उसकी (संवेग परिवर्तन की) दिशा वही होती है जो बल की है।

F = ma
बल=द्रव्यमान(mass)×त्वरण(acceleration)

Fबल= (किलोग्रामx मीटर/सेकण्ड x सेकण्ड़),

m--वजन,  a--त्वरण

तृतीय नियम: प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
सबसे पहले न्यूटन ने इन्हे अपने ग्रन्थ फिलासफी नेचुरालिस प्रिंसिपिआ मैथेमेटिका (सन 1687) में संकलित किया था।
त्वरण
किसी वस्तु के वेग मे परिवर्तन की दर को त्वरण (Acceleration) कहते हैं। इसका मात्रक मीटर प्रति सेकेण्ड2 होता है तथा यह एक सदिश राशि हैं।

 प्रथम नियम: प्रत्येक पिण्ड तब तक अपनी विरामावस्था में अथवा सरल रेखा में एकसमान गति की अवस्था में रहता है जब तक कोई बाह्य बल उसे अन्यथा व्यवहार करने के लिए विवश नहीं करता। इसे जड़त्व का नियम भी कहा जाता है।

द्वितीय नियम: किसी भी पिंड की संवेग परिवर्तन की दर लगाये गये बल के समानुपाती होती है और उसकी (संवेग परिवर्तन की) दिशा वही होती है जो बल की है।

तृतीय नियम- जब किसी वस्तु पर बल लगाया जाता है तो दूसरी वस्तु भी पहली वस्तु पर उतना ही बल विपरीत दिशा में लगाती है

उदाहरण प्रथम नियम

1. रूकी हुई गाड़ी के अचानक चलने पर उसमें बैठे यात्री पीछे की ओर झुक जाते है !
2. चलती हुई गाड़ी के अचानक रूकने पर उसमें बैठे यात्री आगे की ओर झुक जाते है !
3. पेड़ को हिलाने से उसके फल टूटकर नीचे गिर जाते है !
v=u+at(प्रथम नियम)

उदाहरण –
1. क्रिकेट खिलाड़ी तेजी से आती हुई गेंद को केंच करते समय अपने हाथों को गेंद के वेग को कम करने के लिए पीछे की ओर खीच लेता है। ताकि उसकेा चोट न लगे !
2. गद्दा या मिट्टी के फर्श पर गिरने से सीमेंट के फर्श की तुलना कम चोंट आती है !
S=ut+1/2at2

: उदाहरण –तृतीय नियम
1. बन्दूक से गोली छोड़ते समय पीछे की ओर झटका लगना !
2. कुँए से पानी खीचते समय रस्सी टूट जाने पर व्यक्ति का पीछे गिर जाना !
3. राँकेट का आगे बढ़ना, उंचाई के कूंदने पर चोट लगना !









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